देश की आजादी के बाद भी पुर्तगालियों के कब्जे में था दादरा और नगर हवेली, 1961 में बना था देश का हिस्सा

देश की आजादी के बाद भी पुर्तगालियों के कब्जे में था दादरा और नगर हवेली, 1961 में बना था देश का हिस्सा

नई दिल्ली, 1 अगस्त (आईएएनएस)। लंबे संघर्ष के बाद 2 अगस्त 1954 को दादरा और नगर हवेली पुर्तगालियों के शासन से आजाद हुआ था और 11 अगस्त 1961 को देश का हिस्सा बना था। यहां काफी लंबे वक्त से पुर्तगालियों का कब्जा था। पुर्तगालियों से आजाद होने के बाद 1954-1961 तक यहां की जनता ने खुद शासन चलाया था, जिसको वरिष्ठ पंचायत के नाम से जाना जाता है।

18वीं शताब्दी से ही दादरा और नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे में था। वर्ष 1947 में भारत की आजादी के बाद भी पुर्तगालियों ने दादरा और नगर हवेली पर कब्जा जमाए रखा था। पुर्तगाली इस हिस्से को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। जिसके बाद भारत ने सीधी सैन्य कार्रवाई के रास्ते को नहीं चुना बल्कि स्थानीय सैन्य संगठनों से दबाव बनाना शुरू किया था।

एक लंबे संघर्ष के बाद 22 जुलाई 1954 को आजाद गोवा आंदोलन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आजाद गोमंतक दल और स्थानीय आदिवासियों ने मिलकर पुर्तगालियों को दादरा और नगर हवेली से भगा दिया। इसके बाद वर्ष 1954 से 1961 तक वरिष्ठ पंचायत के माध्यम से यहां का शासन चला। भारत सरकार की ओर से वर्ष 1961 में संवैधानिक प्रक्रिया के तहत दादरा और नगर हवेली का भारतीय संघ के तौर पर ऐलान किया गया। 11 अगस्त 1961 को संसद में दादरा और नगर हवेली अधिनियम, 1961 पारित किया गया, जिसके बाद यह केंद्र शासित प्रदेश बन गया।

इस संग्राम में दो महिलाओं ने बड़ी भूमिका निभाई थी। एक थीं हेमवतीबाई नाटेकर और दूसरी थीं ललिता फड़के। इन दोनों महिलाओं ने पुर्तगालियों के खिलाफ संघर्ष में बड़ा योगदान दिया था। हेमवतीबाई नाटेकर का जिनका भारत की सीमा में सिलवासा के नजदीक एक सेवाश्रम था। उन्होंने वाकणकर, काजरेकर, नरवणे को पूर्व तैयारी के लिए आश्रम से सभी प्रकार की सहायता दी थी। यह स्थान क्रांतिकारियों के लिए आश्रय स्थान था। उन्होंने सभी प्रकार के खतरे उठाते हुए सहायता की थी।

वहीं, ललिता फड़के, सुधीर फड़के की पत्नी थीं। इस संग्राम के दौरान वह अधिक से अधिक जानकारी हासिल कर अपने सहयोगियों की मदद करती थीं। उन्होंने सुधीर फड़के के साथ लगातार कठिन प्रवास किया।

--आईएएनएस

एसडी/पीएम