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गोबरधन स्कीम के तहत स्थापित होंगे 20,000 नए बायोगैस प्लांट, पशुपालकों की बढ़ेगी आमदनी

गोबरधन

बनासकांठा, 25 अगस्त (आईएएनएस)। गुजरात सरकार ने ग्रामीण इलाकों में गोबर से क्लीन एनर्जी और ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर बनाकर 'वेस्ट टू वेल्थ' का नया मार्ग अपनाया है। सरकार के इस संकल्प को सिद्ध करने में केंद्र सरकार की गोबर-धन योजना सहायक बन रही है।

गुजरात सरकार ने गोबरधन योजना की मदद से वित्तीय वर्ष 2026-27 में राज्य में 20,000 नए 2-क्यूबिक मीटर फ्लेक्सिबल बायोगैस प्लांट लगाने का फैसला लिया है। इन बायोगैस प्लांट्स को अमूल, बनास, दूधसागर और एनडीडीबी जैसी मिल्क सोसाइटियों के मजबूत नेटवर्क की मदद से लगाया जाएगा। इसके साथ ही स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत पशुपालकों को बायोगैस प्लांट के लिए 25,000 हजार रुपए की आर्थिक मदद भी दी जाएगी। इससे जहां ग्रामीण महिलाओं को रसोई के धुएं से राहत मिलेगी, वहीं हर साल 8 से 10 एलपीजी सिलेंडर का खर्च बचेगा और प्रदूषण से भी मुक्ति मिलेगी। इतना ही नहीं, सरकार के इस निर्णय से क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ लड़ाई को भी मजबूती मिलेगी।

बनास डेयरी के एमडी संग्राम चौधरी ने कहा कि रिन्यूएबल और क्लीन एनर्जी क्लाइमेट चेंज की वजह से ओजोन लेयर को जो नुकसान पहुंच रहा है, उससे बचाव करती है। साथ ही कम्प्रेस्ड सीएनजी की वजह से हमें कार्बन उत्सर्जन से मुक्ति मिलती है, जो कि ग्लोबल वार्मिंग का एक बड़ा कारण है।

सरकार की गोबरधन स्कीम ग्रामीण इलाकों में बदलाव का बड़ा माध्यम बन रही है। इसके तहत जहां गोबर, कृषि अवशेषों और अन्य जैविक कचरे को कंप्रेस्ड बायोगैस और जैविक खाद जैसे उपयोगी संसाधनों में बदला जा रहा है, वहीं किसानों और पशुपालकों को गोबर की बिक्री से अतिरिक्त आमदनी भी हो रही है। बनासकांठा में बनास डेयरी द्वारा ऐसा ही कमर्शियल बायोगैस प्लांट स्थापित किया गया है, जिसके लिए आसपास के गांवों के पशुपालकों से गोबर खरीदा जा रहा है।

पशुपालक रामजीभाई चौधरी ने कहा कि पहले हम गोबर का उपयोग करते थे और खेती में भी इस्तेमाल करते थे। जब से प्लांट लगा है तब से हम सारा गोबर वहीं भेजते हैं। रोजाना डेयरी से ट्रैक्टर आता है, गोबर ले जाता है।

रिंकूबेन चौधरी ने कहा कि डेरी से होने वाली इनकम दूध से होने वाली आमदनी और बायोगैस प्लांट से होने वाली इनकम इन सबसे हमारे बच्चों और हमें बहुत मदद मिलती है और हमारे बच्चों का जीवन स्तर भी बेहतर हुआ है।

गुजरात सरकार पहले ही मिल्क सोसाइटियों के सहयोग से 88 क्लस्टर्स में 14,000 बायोगैस प्लांट को सफलतापूर्वक चालू कर चुकी है। एक बायोगैस प्लांट से सालभर में करीब 834 किलोग्राम कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन कम होता है। जाहिर है कि इससे ग्रामीण स्तर पर राज्य के 'नेट जीरो' कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी, साथ ही पशुपालकों को हर साल हजारों रुपए की बचत भी होगी। इतना ही नहीं बायोगैस प्लांट से निकलने वाली बायो-स्लरी को ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर के तौर पर इस्तेमाल करने से किसानों को रासायनिक खाद से आजादी मिलेगी और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता में भी इजाफा होगा।

--आईएएनएस

डीकेएम/डीकेपी