नई दिल्ली, 13 अगस्त (आईएएनएस)। भारत के महानतम मुक्केबाजों में शुमार हवा सिंह श्योराण ने अपनी आक्रामक शैली, दमदार पंच और शानदार तकनीक से देश का नाम रोशन किया है। खेल के प्रति उनका समर्पण और अनुशासन आज भी युवा मुक्केबाजों को प्रेरणा देता है।
16 दिसंबर 1937 को हरियाणा स्थित भिवानी जिले के उमरवास गांव में जन्मे हवा सिंह बचपन से ही हमउम्र बच्चों की तुलना में उनसे काफी बलशाली थे। लंबी-चौड़ी कद-काठी वाले हवा सिंह 19 साल की उम्र में भारतीय सेना में शामिल हो गए। यह साल 1956 था।
सेना में शामिल होने के बाद हवा सिंह ने शौकिया तौर पर बॉक्सिंग शुरू कर दी, लेकिन इस खेल के प्रति उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई। हवा सिंह चीजों को बेहद जल्द सीख लेते थे; इसी कारण वह जल्द एक शानदार बॉक्सर बन गए।
आर्मी से जुड़ने के सिर्फ 4 साल बाद, साल 1960 में हवा सिंह ने मोहब्बत सिंह को मात देकर वेस्टर्न कमांड का खिताब अपने नाम कर लिया। हवा सिंह ने उस मुक्केबाज को शिकस्त दी थी, जो उस दौर के चैंपियन थे। इसके बाद हवा सिंह लगातार 11 वर्षों तक नेशनल चैंपियन बने रहे। साल 1966 में उन्हें 'अर्जुन अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया। दो साल बाद साल 1968 में 'बेस्ट स्पोर्ट्समैन' ट्रॉफी से सम्मानित किए गए।
हवा सिंह के पास एशियन गेम्स 1962 में देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका था, लेकिन पैसों की तंगी के चलते वह इसमें हिस्सा नहीं ले सके। चार साल बाद उन्होंने एशियन गेम्स 1966 में हिस्सा लिया, जिसमें गोल्ड अपने नाम किया। साल 1970 के एशियन गेम्स में भी गोल्ड जीतकर देश का नाम रोशन किया।
यूं तो, एशियन गेम्स 1974 में भी हवा सिंह ने अपने प्रतिद्वंदी को बुरी तरह परास्त किया था, लेकिन रेफरी का फैसला विवादित रहा, जिसके चलते वह लगातार तीसरी बार गोल्ड नहीं जीत सके। आखिरकार साल 1980 में हवा सिंह ने मुक्केबाजी से संन्यास ले लिया।
हवा सिंह ने न सिर्फ भारतीय मुक्केबाजी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि युवा मुक्केबाजों को भी निखारा। 80 के दशक में जब स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) ने देशभर में बॉक्सिंग सेंटर शुरू किए, तो भिवानी सेंटर की कमान हवा सिंह को सौंपी गई। मशहूर बॉक्सर राजकुमार सांगवान इसी सेंटर के पहले बैच के बॉक्सर हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया। भिवानी जिला आज देश में 'मिनी क्यूबा' के नाम से मशहूर है, जिसमें हवा सिंह का अहम योगदान है।
हवा सिंह को अगस्त 2000 में 'द्रोणाचार्य अवॉर्ड' प्रदान किया जाना था, लेकिन इससे 15 दिन पहले, 14 अगस्त 2000 को उनका देहांत हो गया, जिसके बाद यह अवॉर्ड उनकी पत्नी को सौंपा गया।
हवा सिंह के बेटे संजय श्योराण ने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया, जो खुद एशियन मेडलिस्ट और भीम अवॉर्डी रहे। इसके अलावा, उन्होंने नामी मुक्केबाजों को प्रशिक्षण भी दिया। संजय की बेटी नुपुर श्योराण इस परंपरा की तीसरी कड़ी हैं, जो 5 बार की नेशनल चैंपियन रही हैं।
--आईएएनएस
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