नई दिल्ली, 5 अगस्त (आईएएनएस)। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के सात साल पूरे होने पर बुधवार को संसद परिसर और सदन दोनों में जमकर सियासत देखने को मिली। कांग्रेस समेत एकजुट विपक्ष ने केंद्र सरकार पर जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकार छीनने का आरोप लगाया और राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग की। वहीं सरकार पर सदन न चलने देने और न्यायपालिका के आदेशों की अनदेखी करने के भी आरोप लगे।
कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने आईएएनएस से बात करते हुए इस दिन को 'काला अध्याय' बताते हुए कहा, "इस दिन जम्मू-कश्मीर के लोगों की गरिमा, अधिकार और राज्य का दर्जा छीन लिया गया था। आज सुबह भी एकजुट विपक्ष ने मार्च निकालकर मांग की कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को उनके अधिकार वापस मिलें। राज्य का दर्जा बहाल किया जाना चाहिए और जमीन, नौकरी, अवसरों और संसाधनों पर उनके संवैधानिक अधिकार भी वापस मिलने चाहिए। यह हमारी और एकजुट विपक्ष की भी मांग है।"
खेड़ा ने आगे कहा, "आज कश्मीर के लोगों की गरिमा, उनके अधिकारों और उनके विशेष दर्जे को छीने हुए सात साल हो गए हैं। उस दिन जो हुआ, वह एक काला अध्याय था। कुछ पल के लिए राजनीति को एक तरफ रखकर कश्मीर के लोगों और उन्होंने जो कुछ सहा है, उसके बारे में सोचिए। उनसे उनके अधिकार छीन लिए गए। हम लगातार यह मुद्दा उठाते रहे हैं। आज सुबह, पूरे एकजुट विपक्ष ने भी एक मार्च निकाला और मांग की कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को उनके अधिकार वापस मिलें। उन्हें राज्य का दर्जा तो मिलना ही चाहिए, लेकिन इसके अलावा जमीन, नौकरियों, अवसरों और संसाधनों से जुड़े उनके संवैधानिक अधिकारों को भी पूरी तरह बहाल किया जाना चाहिए। मैं नेशनल कॉन्फ्रेंस के अपने साथियों से भी आग्रह करूंगा कि वे इस मुद्दे को और अधिक जोर-शोर से आगे बढ़ाएं।"
सदन की कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए पवन खेड़ा ने सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "सदन को चलने दें। प्रधानमंत्री को सदन में भेजें। गृह मंत्री को सदन में भेजें। सदन चलेगा। वे क्यों डर रहे हैं? वे क्यों नहीं आते?"
पैलेट गन के मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने कहा, "आप प्रधानमंत्री के मामले में मेटा को बुला सकते हैं, लेकिन जब बच्चों के खिलाफ पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ, तो हम गृह मंत्री को बुला रहे हैं और वे नहीं आ रहे हैं। क्या प्रधानमंत्री की छवि बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा जरूरी है?"
कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने न्यायपालिका के सम्मान का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, "शायद आपको यह बताने की जरूरत नहीं है कि पूरी संसद में मैं अकेला कश्मीरी पंडित हूं। जब मैंने बिल पर चर्चा शुरू की, तो मैंने कहा कि आप यह अध्यादेश 26 मई को लाए थे। सुप्रीम कोर्ट 30 मई को बंद हो गया था और जुलाई में खुला, और संसद का सत्र भी अभी शुरू ही हुआ था। इस अध्यादेश को लाने की क्या जल्दी थी? 95,000 मामले लंबित होने पर, दो या तीन जजों की नियुक्ति से वे तुरंत हल नहीं हो जाते। आप इसे जुलाई में ला सकते थे।"
तन्खा ने कहा, "जजों की संख्या बढ़ाने पर उन्हें आपत्ति नहीं है, लेकिन सरकार न्यायपालिका का सम्मान नहीं करती। अनुच्छेद 370 मामले में, सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने निर्देश दिया था कि जल्द से जल्द चुनाव कराए जाएं और राज्य का दर्जा जल्द से जल्द बहाल किया जाए। लेकिन सरकार ने उन निर्देशों पर कोई कार्रवाई नहीं की है। जब आप न्यायपालिका की बात नहीं सुनते हैं, तो यह सब हमें बेमतलब का लगता है। अगर आप न्यायपालिका को कमजोर कर रहे हैं और उसके निर्देशों को नजरअंदाज कर रहे हैं, तो यह सब करने का क्या मकसद है?"
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा, "हम राज्य का दर्जा बहाल करने का समर्थन करते हैं। जो छीना गया है, उसे वापस दिया जाना चाहिए। मैं खास तौर पर यह कहना चाहता हूं कि कल से हमें ऐसा लग रहा है कि सरकार सदन को एकतरफा तरीके से चला रही है। यह राज्यों की परिषद है, जहां राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। यह गलत है कि सांसदों को अपने राज्यों से जुड़े मुद्दे उठाने की इजाजत नहीं दी जा रही है।"
विपक्ष का कहना है कि 5 अगस्त 2019 को लिए गए फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर के लोगों को न केवल राजनीतिक अधिकारों से वंचित किया गया, बल्कि उनके रोजगार, जमीन और संसाधनों पर भी असर पड़ा।
--आईएएनएस
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