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पाकिस्तान मजहब का करता है सियासी इस्तेमाल, अंतरराष्ट्रीय बिरादरी दे ध्यान: रिपोर्ट

Pakistan

इस्लामाबाद, 15 अगस्त (आईएएनएस)। पाकिस्तान के हुक्मरान हमेशा से ही अपने सियासी फायदे के लिए मजहब का इस्तेमाल करते आए हैं। हाल के दिनों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए जहां ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी और मंत्री धर्म के नाम पर राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हैं। एक रिपोर्ट में इस रवैए की तीखी आलोचना की गई है। कहा गया है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और धार्मिक कट्टरपंथ ने दुनिया के कई हिस्सों में इस्लाम और आतंकवाद को एक-दूसरे से जोड़कर देखने की धारणा को बल दिया है।

भारत और अफगानिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकी भी पाकिस्तान को बेचैन कर रही है। ‘स्ट्रैट न्यूज ग्लोबल’ की इस सप्ताह प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (डीजीआईएसपीआर) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी की हालिया टिप्पणी से भारत-अफगानिस्तान संबंधों को लेकर इस्लामाबाद की बेचैनी स्पष्ट दिखती है। उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि "अफगानिस्तान को भारत के साथ संबंध नहीं रखने चाहिए, क्योंकि भारत एक हिंदू राष्ट्र है।"

रिपोर्ट के अनुसार, अफगान कृषि मंत्री मौलवी अताउल्लाह ओमारी ने जब कहा कि भारत और अफगानिस्तान ‘एक ही डीएनए साझा करते हैं’, तो चौधरी ने इस पर सवाल उठाया कि यदि अफगानों की वंशावली भारतीयों से जुड़ी है तो उन्हें मुस्लिम कैसे माना जा सकता है।

रिपोर्ट ने पाकिस्तान की मजहब के चयनात्मक इस्तेमाल को ‘गंभीर पाखंड’ बताते हुए कहा, " अफगानिस्तान के भीतर हवाई हमलों में महिलाओं और बच्चों सहित आम नागरिकों की मौत को कथित तौर पर उसी धार्मिक कसौटी से नहीं देखा जाता।" काबुल के ओमिड ड्रग रिहैबिलिटेशन सेंटर पर हुए हमले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें नागरिकों के मारे जाने और घायल होने की खबरों के बाद एमनेस्टी इंटरनेशनल ने संभावित युद्ध अपराध की जांच की मांग की थी।

पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व में धर्म को राजनीतिक साधन के तौर पर इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति जनरल असीम मुनीर के कार्यकाल में और अधिक स्पष्ट हुई है। रिपोर्ट इसका भी उल्लेख करती है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि मुनीर के सार्वजनिक भाषणों में इस्लामी संदर्भों और धार्मिक विचारों का इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा, कश्मीर और पाकिस्तान की वैचारिक पहचान जैसे मुद्दों पर किया जाता रहा है।

रिपोर्ट ने पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज (पीआईसीएसएस) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2026 के पहले सात महीनों में पाकिस्तान में आतंकवाद से संबंधित हिंसा में 2,786 लोगों की मौत हुई। जुलाई सबसे घातक महीना रहा, जिसमें बढ़ते संघर्ष के बीच 606 लोगों की जान गई।

अंत में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की गई है कि वो इस ओर ध्यान दें। लिखा है, " धार्मिक अधिकार को अपने तक सीमित रखने और रणनीतिक हितों के अनुसार धर्म की व्याख्या करने की पाकिस्तान की कोशिशें उसकी नीतियों में मौजूद विरोधाभासों को उजागर करती हैं। हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय से धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल को चुनौती देने की अपील करते हैं, क्योंकि इससे कट्टरपंथ को बढ़ावा, क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए खतरा पैदा होता है।ठ

--आईएएनएस

केआर/