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यूपी : बसपा में खत्म हो रहे क्षेत्रीय चेहरे, 2027 के चुनाव में बड़ी चुनौती

यूपी

लखनऊ, 14 अगस्त (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2027 को लेकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में जुटी है, लेकिन उसके सामने केवल चुनावी समीकरण साधने की चुनौती नहीं है। पार्टी के भीतर नेताओं और कार्यकर्ताओं का भरोसा बनाए रखना भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

हाल के दिनों में पहले अपने भतीजे आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ, फिर रणधीर सिंह बेनीवाल और अब पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा के खिलाफ कार्रवाई ने एक बार फिर बसपा के संगठन और नेतृत्व को लेकर चर्चा तेज कर दी है। पार्टी में बड़े और क्षेत्रीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले नेताओं की कमी को आगामी चुनाव में उसके लिए एक बड़ी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि एक दौर में पार्टी की ताकत और अलग-अलग सामाजिक वर्गों के बीच मजबूत कड़ी माने जाने वाले कई प्रमुख नेता अब बसपा में नहीं हैं। पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हमेशा मायावती रही हैं, लेकिन उनके साथ दूसरी कतार के नेताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ये नेता क्षेत्रीय स्तर पर पार्टी की कमान संभालते थे और पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड तक संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते थे।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य, इंद्रजीत सरोज, राम अचल राजभर, बाबू सिंह कुशवाहा, दद्दू प्रसाद और लालजी वर्मा जैसे नेता अपने-अपने सामाजिक आधार और क्षेत्रों में पार्टी का संदेश पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। इनमें से अधिकांश नेता अब दूसरे दलों में हैं और वहां अपनी राजनीतिक भूमिका निभा रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक प्रसून पांडेय कहते हैं कि जब मायावती अपने राजनीतिक उरूज पर थीं, तब वह पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा थीं, लेकिन संगठन में दूसरी पंक्ति और क्षेत्रीय नेताओं की भी मजबूत भूमिका थी। ये नेता अलग-अलग सामाजिक वर्गों से आते थे और अपने-अपने क्षेत्रों में पार्टी का आधार मजबूत करते थे। मायावती जहां दलित वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत रखती थीं, वहीं मुस्लिम समाज के बीच पार्टी की पहुंच बनाने में नसीमुद्दीन सिद्दीकी की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती थी। संगठन के साथ ही मुस्लिम समाज में भी उनकी अच्छी पैठ थी।

प्रसून पांडेय के मुताबिक, स्वामी प्रसाद मौर्य और बाबू सिंह कुशवाहा पिछड़े वर्ग के प्रमुख नेताओं में रहे हैं। खासकर स्वामी प्रसाद मौर्य की पिछड़े वर्ग के बीच मजबूत पकड़ मानी जाती थी। इसके अलावा वह बसपा के कैडर और संगठन को संभालने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। उन्होंने कहा कि इंद्रजीत सरोज की खासतौर पर पासी समाज में मजबूत पकड़ रही है। कौशांबी और आसपास के इलाकों में उनका अच्छा जनाधार माना जाता था। वह बसपा सरकार के दौर में पार्टी के बड़े चेहरों में शामिल रहे, लेकिन बाद में बसपा से अलग होकर समाजवादी पार्टी में चले गए और वहां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

प्रसून पांडेय ने कहा कि अंबेडकर नगर क्षेत्र से आने वाले राम अचल राजभर और लालजी वर्मा उन नेताओं में रहे हैं, जिनका बसपा से जुड़ाव कांशीराम के दौर से बताया जाता है। दोनों मायावती के करीबी नेताओं में गिने जाते थे। बाद में दोनों को पार्टी से बाहर कर दिया गया और अब दोनों समाजवादी पार्टी में हैं। इनमें एक विधायक और एक सांसद हैं।

एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत के मुताबिक, पुराने और जनाधार वाले नेताओं के लगातार अलग होने के बाद मायावती के सामने 2027 के विधानसभा चुनाव में दोहरी चुनौती है। एक तरफ उन्हें अपने पारंपरिक दलित वोट आधार को मजबूती से अपने साथ बनाए रखना होगा, वहीं दूसरी तरफ ब्राह्मण, पिछड़े, मुस्लिम और अन्य गैर-दलित मतदाताओं को भी पार्टी के साथ जोड़कर रखना होगा।

वीरेंद्र सिंह रावत कहते हैं कि किसी भी राजनीतिक दल में नए और जनाधार वाले नेताओं का जुड़ना इस बात का संकेत होता है कि पार्टी का विस्तार हो रहा है और उसके सत्ता में आने की संभावनाएं भी बन रही हैं। इसके विपरीत, चुनाव के नजदीक लगातार नेताओं का पार्टी से बाहर होना अच्छा संदेश नहीं देता। ऐसे में नेताओं और कार्यकर्ताओं का भरोसा कायम रखना मायावती के सामने बड़ी चुनौती है।

--आईएएनएस

विकेटी/एसके