स्वदेशी वॉरशिप निर्माण में भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर, एक ही दिन में तीन अलग-अलग श्रेणियों के वॉरशिप के कमीशनिंग का बना रिकॉर्ड

स्वदेशी वॉरशिप निर्माण में भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर, एक ही दिन में तीन अलग-अलग श्रेणियों के वॉरशिप के कमीशनिंग का बना रिकॉर्ड

नई दिल्ली, 21 जून (आईएएनएस)। भारत ने संकल्प लिया था कि अब हथियारों के मामले में देश पूरी तरह आत्मनिर्भर बनेगा। पिछले एक दशक में आत्मनिर्भरता अभियान को नई रफ्तार मिली है। सेना के तीनों अंगों में स्वदेशी हथियारों को शामिल करने को प्राथमिकता दी जा रही है। इस दिशा में भारतीय नौसेना सबसे आगे दिखाई देती है।

इसी कडीं में 21 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ही दिन में तीन वॉरशिप भारतीय नौसेना में शामिल किए। खास बात यह रही कि तीनों वॉरशिप का निर्माण कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने किया है।

इस अवसर पर जीआरएसई के सीएमडी, कोमोडोर पी.आर. हरी (रि) ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा कि यह एक ऐतिहासिक क्षण है। उन्होंने कहा कि हमने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। पिछले 65 सालों में हमने भारतीय नौसेना को 80 वॉरशिप सौंपे हैं, लेकिन यह उपलब्धि बेहद खास है।

उन्होंने बताया कि तीन अलग-अलग श्रेणियों के तीन वॉरशिप— पी-17ए एडवांस्ड फ्रिगेट आईएनएस दुनागिरी, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट आईएनएस अग्रय और सर्वे वेसल (लार्ज) आईएनएस संशोधक- को एक ही दिन में डिलीवर किया गया। भारतीय वॉरशिप निर्माण के इतिहास में यह पहली बार है कि एक ही शिपयार्ड द्वारा निर्मित तीन अलग-अलग श्रेणियों के वॉरशिप एक ही दिन में नौसेना को सौंपे गए हों। इससे भी ज्यादा गर्व की बात यह है कि इन तीनों जहाजों का कमीशनिंग भी एक ही दिन में हुआ।

कोमोडोर हरी ने कहा कि वॉरशिप निर्माण एक बेहद खास उद्योग है, जो एक खास इकोसिस्टम पर निर्भर करता है। इस इकोसिस्टम में केवल जहाज निर्माता ही नहीं, बल्कि भारतीय नौसेना, कोस्ट गार्ड , भारतीय उद्योग, सीमित स्तर पर विदेशी उद्योग, कई एमएसएमई और स्वदेशी निर्माता भी शामिल हैं। हाल के सालों में जिस तेजी से जहाजों की डिलीवरी हुई है और एक दर्जन से ज्यादा वॉरशिप का निर्माण पूरा किया गया है, वह इस बात का प्रमाण है कि यह इकोसिस्टम पूरी तरह स्थापित हो चुका है।

उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में जीआरएसई ने आठ वॉरशिप की डिलीवरी की, यानी औसतन हर डेढ़ महीने में एक जहाज। इस उपलब्धि पर खास जोर देते हुए उन्होंने कहा, “अब तक हमने जो दो पी-17ए वॉरशिप डिलीवर किए हैं, वे दोनों निर्धारित समय से पहले पूरे हुए हैं।”

उन्होंने आगे बताया कि फिलहाल जीआरएसई के पास तीन प्रमुख नौसैनिक परियोजनाएं हैं— एक पी-17ए वॉरशिप, चार नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल (एनजीओपीवी) और चार एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट। इनमें से चारों एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट इस वित्तीय वर्ष में, पी-17ए वॉरशिप इस कैलेंडर वर्ष में और नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल परियोजना वर्ष 2029 तक पूरी कर ली जाएगी।

जीआरएसई के विस्तार और उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजना पर उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने कंपनी के लिए स्पष्ट रोडमैप तैयार किया है। इस रोडमैप में रक्षा और गैर-रक्षा दोनों प्रकार के समुद्री प्लेटफॉर्म के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं।

मौजूदा समय में जीआरएसई की निर्माण क्षमता एक साथ 28 जहाजों के निर्माण की है, जो उनके मुताबिक पर्याप्त नहीं है। हालांकि, इस कैलेंडर वर्ष के अंत तक यह क्षमता बढ़कर 32 जहाजों तक पहुंच जाएगी। इसके अलावा, कंपनी दो विस्तार परियोजनाओं- एक ब्राउनफील्ड और एक ग्रीनफील्ड पर काम कर रही है। इनमें से एक परियोजना पश्चिम बंगाल में और दूसरी गुजरात में स्थापित की जा रही है। इन परियोजनाओं को पूरा होने में तकरीबन तीन साल का समय लगेगा।

उन्होंने कहा कि भारत मिशन सागर के तहत हिंद महासागर क्षेत्र और मित्र देशों की मदद कर रहा है। जीआरएसई में निर्मित जहाज मालदीव, मॉरीशस, सेशेल्स और वियतनाम में सेवा दे रहे हैं तथा आने वाले सालों में यह संख्या और बढ़ेगी।

कोमोडोर हरी ने कहा कि भारत में बनने वाले वॉरशिप की डिजाइन भी स्वदेशी है और उनके निर्माण में इस्तेमाल किए जाने वाला स्टील भी भारतीय है। आत्मनिर्भरता की दिशा में पहला कदम डिजाइन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना था, जिसकी शुरुआत लगभग 10-15 वर्ष पहले हुई थी। आज वॉरशिप डिजाइन के क्षेत्र में भारत पूरी तरह सक्षम है। इसके बाद स्टील के स्वदेशीकरण पर काम हुआ।

उन्होंने बताया कि भारतीय वॉरशिप में स्वदेशीकरण का औसत स्तर 80 फीसदी से अधिक है, जबकि कुछ जहाजों में यह 90 प्रतिशत से भी ज्यादा है। अब वॉरशिप का आयात लगभग पूरी तरह बंद हो चुका है और युद्धपोतों का 100 प्रतिशत निर्माण भारत में ही किया जाएगा।

रोजगार के संदर्भ में उन्होंने बताया कि जीआरएसई में लगभग 1,600 स्थायी और करीब 6,500 कांट्रैक्ट कर्मचारी काम करते हैं। यानी कंपनी की अलग अलग जहाज निर्माण यूनिट्स में तकरीबन 8,000 लोग प्रत्यक्ष रूप से काम करते हैं। अगर एमएसएमई, स्थानीय उद्योगों और अन्य सहयोगी संस्थाओं को भी शामिल किया जाए, तो जीआरएसई की अलग अलग जहाज निर्माण परियोजनाओं से लगभग 50,000 लोगों को रोजगार मिलता है।

--आईएएनएस

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