नई दिल्ली, 31 जुलाई (आईएएनएस)। संविधान की प्रस्तावना में 'सेक्युलर' शब्द के उल्लेख पर टिप्पणी के बाद पर्यावरण और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. अंगमो का एक और सोशल मीडिया पोस्ट ने सबका ध्यान खींचा है।
गीतांजलि ने अपनी पोस्ट में कहा, "मैं न तो भाजपा हूं, न ही कांग्रेस। न संघी, न कम्युनिस्ट। न वामपंथी, न दक्षिणपंथी। न समाजवादी, न पूंजीवादी। न उदारवादी, न रूढ़िवादी। न दलित, न ब्राह्मण। न जैन, न बौद्ध, न हिंदू, न पंजाबी, न ओडिया, न लद्दाखी। मैं ये सब हूं, और इनसे भी कहीं ज्यादा। इन सभी 'वादों' से परे। मैं हर चीज से सबसे अच्छी बातें अपनाती हूं और बाकी को छोड़ देती हूं।"
उन्होंने कहा कि जब हम अपने असीम स्वरूप को इंसानों की बनाई हुई श्रेणियों में सीमित करते हैं, तो हम खुद को ही कमतर कर लेते हैं। हमारी सबसे गहरी पहचान न तो राजनीतिक है, न सामाजिक, न धार्मिक और न ही वैचारिक। वह तो स्वयं चेतना है।
इससे पहले गीतांजली ने संविधान की प्रस्तावना में 'सेक्युलर' शब्द के उल्लेख को लेकर कहा था कि संविधान में भारत को 'सेक्युलर' (धर्मनिरपेक्ष) कहना वैसा ही है, जैसे पानी को गीला कहना।
उन्होंने कहा कि 1976 से पहले भी, हमारा संविधान असल में सेक्युलर ही था। अनुच्छेद 14: कानून के सामने समानता, अनुच्छेद 25 से 28: धर्म की आजादी, अनुच्छेद 29 और 30: अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा और कोई राजकीय धर्म नहीं।
उन्होंने कहा कि 'सेक्युलर' शब्द पश्चिम से आया है और यूरोप में चर्च और राज्य के बीच हुए झगड़ों से पैदा हुआ है। यह धार्मिक विविधता के प्रति भारत के ऐतिहासिक नजरिए को पूरी तरह नहीं दिखाता। इसके लिए 'सर्व धर्म समभाव' या सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान जैसे विचार बेहतर हैं।
उन्होंने कहा कि आधुनिक सेक्युलरिज्म से बहुत पहले ही, भारत ने 'वसुधैव कुटुंबकम' की बात की थी। यह स्वभाव से ही सबको साथ लेकर चलने वाला है। इसने हर रास्ते की गरिमा को मानते हुए कई तरह की सोच और दार्शनिक परंपराओं को अपनाया और आगे बढ़ाया है।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावना में 'सेक्युलर' शब्द जोड़ना, दार्शनिक नजरिए से, एक तरह से दोहराव था। यह उस चीज से कमतर चीज का सहारा लेना है, जो भारत हमेशा से रहा है और जिसके लिए खड़ा रहा है। यह विविधता के बारे में भारत की अपनी दार्शनिक समझ को साफ करने के बजाय धुंधला करता है।
--आईएएनएस
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