नई दिल्ली, 20 अगस्त (आईएएनएस)। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने कहा कि संस्था को विचारधारा से ऊपर उठकर काम करना चाहिए और आलोचना को सकारात्मक रूप से लेना चाहिए।
उन्होंने बताया कि उनके कार्यकाल में एक मंत्री ने साफ कहा था कि संस्था के हित में न हो तो कोई सिफारिश मानने की जरूरत नहीं है। राजपूत ने खुलासा किया कि जब उन्होंने कुछ लेखकों से संपर्क किया तो उन्होंने भाजपा के साथ काम न करने का हवाला देकर मेरे सुझाव से इनकार कर दिया था। उन्होंने चीन-जापान का उदाहरण देते हुए कहा कि हर देश अपना इतिहास अपने नजरिए से लिखता है, लेकिन एनसीईआरटी को पूरी तरह समर्पण के साथ काम करना चाहिए।
एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने कहा, "चीन और जापान को देखिए, चीन जो इतिहास लिखता है, जाहिर है कि वो जापान को पसंद नहीं आएगा, और जो जापान लिख रहा है, वो साफ तौर पर चीन पसंद नहीं करेगा। ऐसा होना बहुत ही जाहिर सी बात है। सबसे अच्छी बात यह है कि एनसीईआरटी कोशिश करती है और कम से कम कोशिश करनी चाहिए कि आप संस्था के लिए पूरी तरह से समर्पित रहें, तभी आप ऐसा कर सकेंगे। यह मंत्रियों की तरफ से भी आता है।"
जेएस राजपूत ने कहा, "मैंने जब यह पद संभाला, तो उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता कि मैं कब तक यहां रहने वाला हूं, आप हो सकता है कि पांच साल इस पद पर रहें, लेकिन आप भी चले जाएंगे, लेकिन संस्था रहती है। कभी-कभी राजनीति में रहते हुए मैं आपको कुछ सिफारिश दूंगा, इसको तभी स्वीकार करें, जब ये संस्था के हित में हो, वरना रिजेक्ट कर दें। इस बात ने मुझे बहुत हिम्मत दी और मैं काफी दबाव झेल सका। उस मंत्री ने मुझे कोई नाम या कोई ऐसा काम नहीं दिया कि मुझे ये करना चाहिए या ये नहीं। सरकार बदली, नए मंत्री आए और उन्होंने पूछा कि आपको निर्देश कौन देता था, इसपर मैंने कहा कि मुझे कोई निर्देश नहीं देता था। एनसीईआरटी में प्रकाशित होने वाले हर एक शब्द के लिए मैं जिम्मेदार हूं। एनसीईआरटी को इस आदर्श को जरूर मानना चाहिए।"
उन्होंने कहा कि लोगों को निमंत्रित किया जाता है, वो आते हैं और एनसीईआरटी के लिए लिखते हैं। इसके बाद प्रोफेसर बैठते हैं। वो चाहे तो बाहर से भी किसी को बुला सकते हैं। फिर, इसे फाइनल किया जाता है। इसके बाद कई चरण होते हैं, जैसे कि विभाग के प्रमुख इसे देखेंगे, फिर इसे विशेषज्ञ भी देखते हैं, कई बार ये निदेशक के पास भी जाता है। यह मेरे पास भी कई बार आया है। मेरा काम था कि हां ये सभी के द्वारा देखा गया है, ये सभी चीजें शामिल की गई हैं, शुरुआती ड्राफ्ट किसने लिखा, किसने इसमें सुधार किया और किसने समीक्षा की।
उन्होंने कहा कि मीडिया के पास समय नहीं है। मुझे हाथ से लिखी गई एक चिट्ठी मिली, जिसमें लिखा था कि एनसीईआरटी की तीसरी कक्षा में एक चित्र इस पेज पर बना हुआ है, उसका शीर्षक गलत है। आप उसे ठीक करिए। मैंने वो किताब मंगाई, उसमें एक चित्र था, जिसमें खेत में एक किसान के कंधे पर हल था। चित्र के नीचे लिखा था कि किसान खेत में हल जोत रहा है। ये गलत था। मैंने उसी वक्त सारा काम बंद करके हाथ से उन्हें चिट्ठी लिखी, उनका धन्यवाद किया और चार-पांच किताबें उन्हें अलग से भिजवाई और फिर अपना काम किया।
उन्होंने कहा कि यह एनसीईआरटी है, हम स्कूल, शिक्षक, छात्र समेत सभी से सुझाव लेते हैं। अगले साल जब किताबें पुन: प्रकाशित होती हैं, तब उन्हें ठीक किया जाता है। ऐसी गलतियां मिलती हैं, हर वक्त मिलती हैं।
उन्होंने कहा कि मैं एक व्यक्ति के पास पहुंचा, और उनसे कहा कि सर आपने हमारे लिए इतिहास की यह किताब लिखी है। आपकी इस किताब को लिखने के 30 साल बाद कुछ सुझाव हैं। आप कृपया इसे देखें। जो भी आपको लगता है कि उसे बदला जा सकता है, तो उसे कर दीजिए। मैं लगभग दो-तीन लोगों के घर गया, तीनों हंस रहे थे। वो कहते हैं कि क्या आपको पता नहीं है कि मैं भाजपा के साथ काम नहीं करता हूं। मैंने कहा कि मैं भाजपा नहीं हूं, मैंने उन्हें मनाने की कोशिश की। जब मैं दूसरे शख्स के पास गया तो उन्होंने कहा कि आप अब भी उम्मीद करते हैं कि हम आपके साथ काम करें। मैंने कहा कि क्यों नहीं। दोनों ने मना कर दिया, जिसके बाद मैं तीसरे व्यक्ति के पास नहीं गया। इसके बाद मुझे दूसरे लोगों को लाना पड़ा। शिक्षा विचारधारा से प्रभावित नहीं होनी चाहिए। मैं खुशवंत सिंह समेत कई लोगों से मिला और पूछा कि मैं क्या करूं? उन्होंने कहा कि इन्होंने पर्शियन इतिहासकारों के नजरिए से लिखा है। उन्होंने यहां पर उपलब्ध जानकारी को नजरअंदाज किया है।
--आईएएनएस
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