नई दिल्ली, 15 जुलाई (आईएएनएस)। यह कहानी है एक ऐसे साहित्यकार की, जिसने अपने लेखन को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र की चेतना जगाने का साधन बनाया, जिनके साहित्य में ग्रामीण जीवन की सादगी, भारतीय संस्कृति की गरिमा, स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना और सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा का सशक्त स्वर सुनाई देता है। उनके जीवन के अनुभवों ने ही उनकी रचनाओं को गहराई दी। बात हो रही है हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार जगदीशचंद्र माथुर की।
जगदीशचंद्र माथुर का जन्म 16 जुलाई 1917 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में खुर्जा के पास एक गांव में हुआ। एक छोटे से कस्बे में इनका बचपन बीता। इसी कारण ग्रामीण समस्याओं को उन्होंने बहुत नजदीक से देखा। ग्रामीण जीवन से जुड़े रहने के कारण उन्होंने प्रकृति की सुंदरता, गांव के लोगों का सादा जीवन, उनकी सरलता और लोक संस्कृति की समृद्ध परंपराओं को नजदीक से महसूस किया।
एक ललित निबंध में उन्होंने लिखा, "सौंदर्य मेरी साधना है, किंतु पुरुषार्थ मेरी सौंदर्य साधना से भी परे लोकोत्तर सत्य है।" इन शब्दों में अनजाने ही उनका व्यक्तित्व झलकता है।
जब माथुर का बचपन था, तब भारत आजाद नहीं हुआ था और देश पर अंग्रेजों का शासन था। उसी समय स्वतंत्रता आंदोलन भी चल रहा था। उस दौर में वह स्कूल के छात्र थे और इन घटनाओं का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने देश की गुलामी को देखा, समझा और उसे महसूस भी किया।
उनके साहित्य पर उनके माता-पिता का भी गहरा प्रभाव था। उनके पिता एक आदर्शवादी शिक्षक थे। इच्छा थी कि उनका बेटा और उनके विद्यार्थी उनसे भी अधिक योग्य और गुणवान बनें। इसलिए उन्होंने शुरू से ही माथुर की पढ़ाई और प्रतिभा पर विशेष ध्यान दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि माथुर ने दूसरी या तीसरी कक्षा में ही स्कूल के कार्यक्रमों में अभिनय करना शुरू कर दिया था। जगदीशचंद्र माथुर के जीवन पर आधारित एक लेख में इन बातों की जिक्र मिलता है।
पढ़ाई पूरी करने के बाद जब माथुर सरकारी नौकरी में आए, तब भी देश पर अंग्रेजों का शासन था। अंग्रेजों की शोषण और दमन की नीतियों से जनता परेशान थी। उन्होंने इन अत्याचारों को अपनी आंखों से देखा और देशवासियों की पीड़ा को गहराई से महसूस किया। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से अंधकार और निराशा में जी रही जनता को जागरूक करने का प्रयास किया और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित किया। उनकी रचनाओं 'भोर का तारा', 'विजय की बेला' और 'कोणार्क' में यह भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
जगदीशचंद्र माथुर का साहित्यिक जीवन 1929 में प्रारंभ हुआ। तब उनकी आयु 12 वर्ष की थी। 1929 में 'बाल सखा' के लिए 'मुर्खेश्वर राजा' नामक प्रहसन लिखा था। इसी वर्ष उन्होंने 'लवकुश' नाटक की रचना की।
शासन और शोषण के विरूद्ध उन्होंने अपने पात्रों के माध्यम से आजादी की लड़ाई में अपना सहयोग दिया। सरकारी नौकरी के दौरान उन्हें यह भी महसूस हुआ कि कहीं न कहीं वे भी उस व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं, जो जनता पर अत्याचार कर रही थी। देश और लोगों के दुख ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। कहा जाता है कि इसी भावना को उन्होंने अपने 1937 में लिखे एकांकी 'भोर का तारा' में व्यक्त किया।
उन्होंने अपने अंदर सोये हुए पुरुषार्थ को जगाने के लिए साहित्यिक विधा का आश्रय लिया। उसमें नाट्य विधा और एकांकी विधा प्रमुख है। उन्होंने अपने नाट्य लेखन के लिए इतिहास और पुराण का सहारा लिया, उसे सिर्फ सहारा कहना ही ठीक होगा क्योंकि उन्होंने जो स्पष्ट करना था, वह समकालीन स्थिति का एक अंश है। उन्होंने उन सहारों के जरिए अपने समय की समस्या का चित्रण किया।
जगदीशचंद्र माथुर का साहित्य क्षेत्र असीम रूप में है, मगर साहित्यिक विधाओं की दृष्टि से सीमित ही है। माथुर ने अपनी रचनाओं के लिए साहित्यिक विधाओं में से नाटक, एकांकी, निबंध, रेखाचित्र आदि को चुना। अलग-अलग पत्रिकाओं में उनके कुछ लेख समय-समय पर प्रकाशित हुए थे।
जगदीशचंद्र माथुर को याद करना भारत के अंदर सूचना संचार माध्यमों में हुई क्रांति को याद करना है। 'आकाशवाणी' और 'दूरदर्शन' जैसे शब्द सिर्फ नाम नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और पहचान की आत्मा हैं। इन्हें भारतीय संवेदना से जोड़ने वाले दूरदर्शी साहित्यकार जगदीशचंद्र माथुर ही थे।
गुलामी से मुक्त होकर देश ने आजादी की सांस ली, तो परिवर्तन और निर्माण का नया दौर भी शुरू हुआ। उस नए दौर में ऑल इंडिया रेडियो को भी एक नई पहचान मिली। उन्होंने एआईआर का नाम बदलकर आकाशवाणी किया। 1954 में वे आकाशवाणी के महानिदेशक बने। महानिदेशक के रूप में अनेक कलाकारों और साहित्यकारों को आकाशवाणी से जोड़ने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में, जब 1959 में टेलीविजन शुरू हुआ तो जगदीशचंद्र माथुर ने ही उसका दूरदर्शन नाम दिया।
--आईएएनएस
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