नई दिल्ली, 9 जून (आईएएनएस)। क्या आप जानते हैं कि इंसान की मृत्यु के बाद भी उसकी आंखें इस खूबसूरत दुनिया को देख सकती हैं? चिकित्सा विज्ञान का यह प्रमाणित सच किसी चमत्कार से कम नहीं है कि मौत के बाद भी हमारी आंखें जीवित रहती हैं और एक एकल मृत दाता की आंखों से आज की आधुनिक 'घटक सर्जरी' तकनीक के जरिए दो या उससे अधिक नेत्रहीन लोगों के जीवन में रोशनी लौटाई जा सकती है।
हर साल 10 जून को मनाया जाने वाला 'विश्व नेत्रदान दिवस' और भारत में 25 अगस्त से 8 सितंबर तक आयोजित होने वाला 'राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा' हमें इसी निस्वार्थ और सर्वोच्च मानवीय दान की याद दिलाता है।
पुराने समय में कॉर्निया प्रत्यारोपण में पूरी परत को बदल दिया जाता था, जिसे पेनिट्रेटिंग केराटोप्लास्टी कहते थे। लेकिन आज की आधुनिक नेत्र चिकित्सा 'लैमेलर केराटोप्लास्टी' की ओर बढ़ चुकी है।
इसमें कॉर्निया की केवल उसी परत को बदला जाता है जो खराब होती है। बताया जाता है कि इसकी क्लिनिकल सफलता दर 90 प्रतिशत से अधिक है, और इससे ग्राफ्ट रिजेक्शन (शरीर द्वारा अस्वीकार किए जाने) का खतरा भी न्यूनतम हो जाता है।
अंग और ऊतक दान के क्षेत्र में राष्ट्रीय नोडल एजेंसी (एनओटीटीओ) ने नेत्रदान को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों को तोड़ा है।
मिथक : बुजुर्ग व्यक्ति नेत्रदान नहीं कर सकते।
सत्य : नेत्रदान के लिए कोई अधिकतम आयु सीमा नहीं है। यदि कॉर्निया स्वस्थ और पारदर्शी है, तो किसी भी उम्र में दान संभव है।
मिथक : आंखें निकालने से चेहरा विकृत हो जाता है।
सत्य : यह बेहद सुरक्षित और सम्मानजनक प्रक्रिया है। डॉक्टर केवल कॉर्निया निकालते हैं। यदि पूरा
नेत्रगोलक निकालना पड़े, तो कृत्रिम प्लास्टिक प्रोस्थेटिक आंख लगा दी जाती है, जिससे चेहरा बिल्कुल सामान्य दिखता है।
मिथक : जीवनकाल में संकल्प न लेने पर दान नहीं हो सकता।
सत्य : मृत्यु के बाद परिवार के सदस्य या कानूनी उत्तराधिकारी आपसी सहमति से नेत्रदान करवा सकते हैं।
डिजिटल इंडिया के तहत अब नेत्रदान का संकल्प लेना बेहद आसान हो गया है। राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) की वेबसाइट पर जाकर कोई भी नागरिक ऑनलाइन पंजीकरण कर सकता है। इस प्रक्रिया में नागरिक के पास आधिकारिक पहचान पत्र होना चाहिए।
नेत्रदान के लिए समय सबसे महत्वपूर्ण कारक बताया जाता है, जैसे कि मृत्यु के 6 घंटे के भीतर कॉर्निया निकाल लिया जाना चाहिए।