पीएम मोदी का दशकों पुराना जापान कनेक्शन, जिसने भारत-जापान रणनीतिक साझेदारी की रखी मजबूत नींव

पीएम मोदी का दशकों पुराना जापान कनेक्शन, जिसने भारत-जापान रणनीतिक साझेदारी की रखी मजबूत नींव

नई दिल्ली, 2 जुलाई (आईएएनएस)। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची का भारत दौरा दोनों देशों के संबंधों को नई मजबूती देगा। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जापान के साथ यह रिश्ता 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नहीं, बल्कि कई दशक पहले शुरू हो चुका था। जापान की संस्कृति, तकनीकी उत्कृष्टता और वहां के लोगों के प्रति उनका आकर्षण लंबे समय से रहा है।

मोदी अर्काइव द्वारा शेयर किए गए एक एक्स पोस्ट में बताया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जापान से पहला व्यक्तिगत जुड़ाव 1980 के दशक की शुरुआत में हुआ था। उस समय वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के युवा प्रचारक थे। नेपाल यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात जापान के नागोया शहर के एक युवक से हुई, जिसके साथ उनकी मित्रता वर्षों तक पत्राचार के माध्यम से बनी रही।

बताया जाता है कि उनके जापानी मित्र उन्हें समय-समय पर जापान के प्रसिद्ध ब्रांडों के जूते और टी-शर्ट जैसे उपहार भेजते थे। इसके बदले पीएम मोदी ने उन्हें एक बार श्रीमद्भगवद्गीता की प्रति भेंट की। कम उम्र में भी वे अंतरराष्ट्रीय मित्रता को केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम मानते थे।

समय के साथ जापान के प्रति उनका आकर्षण और गहरा होता गया। वर्ष 2007 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जापान यात्रा के दौरान, उन्होंने इस दौरे को केवल कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सीखने के अवसर के रूप में देखा। 40 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ, उन्होंने टोक्यो, ओसाका, हिरोशिमा और कोबे का दौरा किया।

इस दौरान उन्होंने मित्सुबिशी, मित्सुई, सुमितोमो, मारुबेनी, सुजुकी, तोशिबा, निप्पॉन स्टील और निसान स्टील जैसी प्रमुख जापानी कंपनियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस यात्रा के परिणामस्वरूप जापानी निवेश संस्था जेट्रो और गुजरात सरकार के बीच महत्वपूर्ण समझौते भी हुए।

इसी यात्रा के दौरान पीएम मोदी की मुलाकात जापान के तत्कालीन उभरते हुए प्रमुख नेता शिंजो आबे से हुई। दोनों नेताओं की यह पहली मुलाकात आगे चलकर विश्व राजनीति की सबसे मजबूत व्यक्तिगत मित्रताओं में से एक की नींव बनी। इस मुलाकात के साक्षी रहे लोगों के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच तत्काल पारस्परिक सम्मान और विश्वास का रिश्ता विकसित हुआ। बाद के वर्षों में, जब शिंजो आबे अस्वस्थ थे, तब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नियमित रूप से उनका हालचाल लेते रहे।

जापान प्रवास के दौरान मोदी ने विश्वप्रसिद्ध शिंकानसेन बुलेट ट्रेन में यात्रा की। इसी सफर के दौरान उन्होंने भारत में भी बुलेट ट्रेन नेटवर्क विकसित करने की कल्पना की। उन्हें चालक के कॉकपिट में बैठने का दुर्लभ अवसर मिला, जहां उन्होंने इंजीनियरों से भूकंप सुरक्षा प्रणाली, समय प्रबंधन और अन्य तकनीकी पहलुओं के बारे में विस्तार से जानकारी ली। बाद में यही अनुभव भारत की हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं की सोच का हिस्सा बने।

बुलेट ट्रेन की यात्रा के दौरान भाषा की बाधा के बावजूद उन्होंने जापानी बच्चों से संवाद स्थापित किया और सफर का बड़ा हिस्सा उनके साथ बिताया।

टोक्यो के प्रसिद्ध सेंसोजी मंदिर में भी उनकी जिज्ञासा स्पष्ट दिखाई दी। उन्होंने वहां की भीड़ प्रबंधन व्यवस्था, शहरी नियोजन और कर्मचारियों के प्रशिक्षण प्रणाली का गहराई से अध्ययन किया। उनका उद्देश्य यह समझना था कि भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों के प्रबंधन में इन व्यवस्थाओं का उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है।

जापान के एक विश्वविद्यालय में जब उनसे पूछा गया कि भारत और जापान को चीन के बढ़ते प्रभाव का सामना किस प्रकार करना चाहिए, तो उन्होंने एक उल्लेखनीय उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, "अंधकार को तलवार से नहीं हराया जा सकता, एक छोटा-सा दीपक भी अंधकार को दूर कर सकता है।" उनका कहना था कि साझा लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर भारत और जापान मिलकर वही प्रकाश बन सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मानना रहा कि कूटनीति केवल सरकारों के बीच नहीं, बल्कि लोगों के बीच भी मजबूत होनी चाहिए। गुजरात के स्वर्ण जयंती समारोह के दौरान उन्होंने जापान में रहने वाले गुजरातियों से महात्मा मंदिर के निर्माण के लिए मिट्टी और जल भेजने की अपील की, ताकि वे भी गुजरात के विकास में सहभागी बन सकें। उन्होंने भारतीय प्रवासी समुदाय से अपने जापानी मित्रों को भारत आने के लिए भी प्रेरित किया।

कच्छ में आए विनाशकारी भूकंप के बाद पुनर्वास कार्यों के दौरान उन्होंने जापान के कोबे शहर के भूकंप-रोधी निर्माण मॉडल से प्रेरणा ली, जिसने स्वयं भी भीषण भूकंप का सामना किया था। इसी प्रकार गुजरात में बच्चों के कुपोषण से निपटने के लिए योजनाएं बनाते समय अधिकारियों को जापान की मिड-डे मील व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए भी प्रोत्साहित किया।

वर्ष 2012 में जब पीएम मोदी दोबारा जापान पहुंचे, तब उन्हें एक राज्य के मुख्यमंत्री के लिए बेहद दुर्लभ सम्मान मिला। भारत-जापान राजनयिक संबंधों की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर जापान सरकार ने उन्हें औपचारिक रूप से आमंत्रित किया। पांच दिनों में उन्होंने पांच शहरों में 40 से अधिक कार्यक्रमों में भाग लिया।

जापानी समाचार पत्र निक्केई ने उन्हें भारत के एक व्यवसाय समर्थक नेता के रूप में प्रस्तुत किया। नवरात्रि का व्रत रखने और अत्यंत व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने निवेशकों के साथ लंबे समय तक संवाद किया।

इस यात्रा के दौरान उन्होंने सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन के प्रमुख ओसामु सुजुकी के आवास पर पारंपरिक जापानी संस्कृति का अनुभव किया। इसके बाद उन्होंने अचानक सुजुकी के विनिर्माण संयंत्र का दौरा करने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि आगामी वाइब्रेंट गुजरात समिट के माध्यम से गुजरात को जापानी निवेश की आवश्यकता होगी। इसके बाद उन्होंने तीन घंटे से अधिक समय तक ऑटोमोबाइल निर्माण की प्रत्येक प्रक्रिया का अध्ययन किया और वहां कार्यरत भारतीय इंजीनियरों से भी बातचीत की।

जेट्रो बिजनेस फोरम में उन्होंने भारत-जापान आर्थिक सहयोग को लेकर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा, "जापान के पास अनुभव की शक्ति है, गुजरात के पास उद्यम की ताकत है। जापान के पास तकनीक है और गुजरात के पास उसे आत्मसात करने की क्षमता है।"

कोबे पोर्ट की यात्रा के दौरान, उन्होंने केवल दूर से निरीक्षण करने के बजाय नाव से परिचालन क्षेत्र का दौरा करने पर जोर दिया। विश्वस्तरीय बंदरगाह अवसंरचना को देखकर, उन्होंने कहा, "एक दिन मैं धोलेरा को भी ऐसा ही बनाऊंगा।"

वर्षों बाद जब वह भारत के प्रधानमंत्री बने, तो उनके इन शुरुआती अनुभवों ने भारत-जापान संबंधों को नई दिशा दी। मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना, दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, रक्षा सहयोग, सप्लाई चेन रेजिलिएंस और तकनीकी साझेदारी जैसे अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग मजबूत हुआ। इन पहलों की बुनियाद उन अनुभवों और संबंधों में पहले ही रखी जा चुकी थी, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई दशक पहले जापान के साथ स्थापित किए थे।

--आईएएनएस

डीएससी