डेढ़ सदी बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी लौटा ईशावास्य उपनिषद, इस बार आचार्य प्रशांत की वाणी में

डेढ़ सदी बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी लौटा ईशावास्य उपनिषद, इस बार आचार्य प्रशांत की वाणी में

ऑक्सफोर्ड, 10 जून (आईएएनएस)। जिस ऑक्सफोर्ड से प्रोफेसर मैक्स म्यूलर ने 1879 में सेक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट श्रृंखला के पहले खंड में ईशावास्य उपनिषद का पहला अंग्रेजी अनुवाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित कराकर इस ग्रंथ को पश्चिम तक पहुंचाया था, लगभग डेढ़ सौ वर्ष बाद उसी भूमि पर एक भारतीय दार्शनिक उसी उपनिषद को उसके मूल जीवंत अर्थ में लौटाने पहुंचा।

मैक्स म्यूलर स्वयं ऑक्सफोर्ड में तुलनात्मक भाषाविज्ञान के प्रथम प्रोफेसर थे, और ‘सेक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट’ की समूची श्रृंखला उन्हीं की देखरेख में तैयार हुई थी। 8 जून को ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के मैनर रोड बिल्डिंग स्थित लेक्चर थिएटर में आचार्य प्रशांत ने ईशावास्य उपनिषद के द्वितीय श्लोक पर एक विस्तृत दार्शनिक सत्र को संबोधित किया।

सत्र से पूर्व उसी दिन ऑक्सफोर्ड के छात्रों ने आचार्य प्रशांत को परिसर की विस्तृत यात्रा करायी, जिसमें ऐतिहासिक न्यू कॉलेज और सॉमरविल कॉलेज सहित कई स्थल शामिल रहे। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की इमारत के सामने उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "मैक्स म्यूलर ने इस ग्रंथ को पश्चिम तक पहुंचाने का असाधारण कार्य किया। पर शब्दों को जीवन देना पड़ता है, और जीवन यही क्षण है। आज मैं उपनिषद की उस प्रासंगिकता को सामने रखने आया हूं, जिसकी आज के संसार को आवश्यकता है।"

जिस मैनर रोड बिल्डिंग में यह सत्र हुआ, वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग का केंद्र है और प्रतिष्ठित एटकिंसन मेमोरियल लेक्चर का स्थल रहा है, जहां हाल के वर्षों में नोबेल पुरस्कार विजेताओं सहित अर्थशास्त्र, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जलवायु पर विश्व के कुछ अग्रणी विचारक संबोधन दे चुके हैं। इसी भवन में, जहां अर्थशास्त्र और नीति जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं, आचार्य प्रशांत ने वेदांत की दृष्टि से यह तर्क रखा कि अकेले अर्थशास्त्र, तकनीक या नीति इस संकट को हल नहीं कर सकते, जब तक उपभोग करने वाला मनुष्य स्वयं को न परखे।

मीडिया से बातचीत में आचार्य प्रशांत ने इस संदेश को एक व्यापक चेतावनी का रूप दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिम ने बाहरी जगत में, चाहे वह ब्रह्मांड का अन्वेषण हो, परमाणु में प्रवेश हो या शरीर के रहस्यों की खोज, असाधारण उपलब्धियां अर्जित की हैं, फिर भी मानवता आज छठे बड़े पैमाने पर विलुप्ति के दौर में है, और यह संकट पूर्णतः मनुष्य का गढ़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि जिन उपकरणों, तकनीक और आर्थिक समृद्धि पर हमें गर्व है, वही आज विनाश की सेवा में लगे हुए हैं। उनका मत था कि आत्मज्ञान और आत्म की व्यापक आंतरिक शिक्षा के बिना किसी प्रकार की मुक्ति की संभावना बहुत क्षीण है, और यही बात पर्यावरण संकट, सांप्रदायिकता, अंतरराष्ट्रीय विभाजन, परमाणु युद्ध के खतरे और मानसिक स्वास्थ्य की महामारी, सभी पर समान रूप से लागू होती है।

सत्र में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों और रिसर्च स्कॉलर्स सहित यूके, यूरोप और अमेरिका का एक विविध श्रोता-समूह उपस्थित रहा। सत्र का केंद्रीय प्रश्न था, "कर्ता कौन है?" आचार्य प्रशांत ने कहा कि उपनिषद कर्म से अधिक उस कर्ता में रुचि रखते हैं, जो प्रत्येक विचार, कर्म और अनुभव के पीछे खड़ा रहता है। विद्या और अविद्या के भेद को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि बाहरी, अनुभवगम्य जगत का ज्ञान मनुष्य के पास प्रचुर है और वह निरंतर बढ़ता रहे, परंतु जानने वाले को जानने का कार्य आज भी अधूरा है। उन्होंने कहा, "अहम न केवल दुख भोगता है, वह स्वयं ही दुख है।" उनका कहना था कि कोई भी कर्म अपने आप में न शुभ है न अशुभ; वह जिस चेतना से उपजता है, वही उसे बंधनकारी या मुक्तिदायी बनाती है।

सत्र में उन्होंने यह भी कहा कि मृत्यु का भय वस्तुतः शरीर का नहीं, अहम का भय है, क्योंकि अहम ही अपने अस्तित्व के विलोप से भयभीत रहता है। अहम की तुलना उन्होंने एक उपनिवेशक से की, जो शरीर को प्रेम से नहीं, अपने स्वार्थ से जीवित रखता है। उनका कहना था कि सच्ची स्वतंत्रता अहम को और अधिक विकल्प मिलने में नहीं, बल्कि अहम की बाध्यताओं से मुक्ति में निहित है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा, "शरीर एक तथ्य है, अहम एक भूल," और यह भी कि "सर्वश्रेष्ठ कर्म अहम की अनुपस्थिति में ही घटित होते हैं।"

ऑक्सफोर्ड में एक भारतीय द्वारा वेदांत पढ़ाए जाने को आचार्य प्रशांत ने एक सार्थक संयोग बताया। उन्होंने कहा कि वेदांत का ज्ञान कभी गुप्त नहीं रहा; जो भी सीखना चाहे, सीख सकता है, और पात्रता का आधार जन्म, जाति या वर्ण नहीं, बल्कि साधन चतुष्टय में वर्णित योग्यताएं हैं, जो पूर्णतः गुण-आधारित हैं। उन्होंने जोड़ा कि जिस पश्चिमी परंपरा ने कभी इस ज्ञान को बाहर से, एक अध्येय वस्तु के रूप में देखा था, वहां आज वही ज्ञान उसकी जीवित परंपरा के भीतर से प्रस्तुत हो रहा है। उनका कहना था कि भारत सदैव साझा करता आया है और पश्चिम ने भी साझा किया है, क्योंकि समस्त राजनीतिक और सांस्कृतिक सीमाओं से परे मनुष्य एक ही प्रजाति है, और यही एकत्व समस्त ज्ञान का आधार है।

यह ऑक्सफोर्ड सत्र आचार्य प्रशांत के यूके दौरे की एक कड़ी है, जो पहले ही कई उल्लेखनीय पड़ावों से गुजर चुका है। 30 मई को उन्होंने कैम्ब्रिज यूनियन में, कैम्ब्रिज इंडिया बिजनेस डायलॉग के अंतर्गत, कैम्ब्रिज जज बिजनेस स्कूल के प्रोफ़ेसर जयदीप प्रभु की अध्यक्षता में आयोजित सत्र में अपना दर्शन रखा, जो नियत समय से कहीं आगे तक चला। 1 जून को एनआईएसएयू यूके द्वारा आयोजित एक संवाद सत्र में उन्होंने लॉर्ड क्रिश रावल (यूके के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के सदस्य) के साथ जलवायु और पर्यावरण संकट के आंतरिक आयामों पर विस्तृत चर्चा की।

इससे पहले 6 और 7 जून को काठमांडू में आयोजित चौथे काठमांडू कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल में आचार्य प्रशांत की भागीदारी रही, जहाँ लंदन से ऑनलाइन जुड़ते हुए उन्होंने आज तक के एक वरिष्ठ संपादक के साथ बातचीत की। इसी मंच पर ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. प्रतिभा राय ने उन्हें "भारत का पुत्र" कहकर संबोधित किया, जिसे आचार्य प्रशांत ने डॉ. राय की उदारता बताते हुए स्वीकार किया।

इन सभी मंचों पर आचार्य प्रशांत का केंद्रीय तर्क एक ही रहा है, कि पश्चिमी जलवायु नीति इसलिए अपर्याप्त सिद्ध हो रही है क्योंकि वह उपभोग करने वाले अहम को अपरीक्षित छोड़ देती है। उन्होंने कहा, "बाहर से हम इतिहास में किसी भी समय की तुलना में अधिक समृद्ध और शक्तिशाली हैं। भीतर से हम आज भी आदिम मनुष्य ही हैं।" उनका कहना है कि कोई शिखर सम्मेलन, कोई संधि या दक्षता में सुधार इस संकट का समाधान नहीं कर सकता, क्योंकि इनमें से कोई भी उस मूल कारक को संबोधित नहीं करता जो संकट को चला रहा है।

आगामी सप्ताहों में आचार्य प्रशांत लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) और किंग्स कॉलेज लंदन में भी सत्र आयोजित करेंगे। 20 से 28 जून तक चलने वाले लंदन क्लाइमेट ऐक्शन वीक में भी उनकी भागीदारी निर्धारित है, जो यूरोप का सबसे बड़ा स्वतंत्र जलवायु परिवर्तन से संबंधित आयोजन है।

प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक और हार्परकॉलिन्स द्वारा प्रकाशित ट्रुथ एंड एपोलॉजी के लेखक आचार्य प्रशांत ने ऑक्सफोर्ड में आईएएनएस से कहा कि ऑक्सफोर्ड तर्क, विश्लेषण और बौद्धिक कठोरता की भूमि है, और वेदांत भी उन्हीं उपकरणों को भीतर की ओर मोड़ने का आग्रह करता है। उन्होंने कहा, "अंतर केवल इतना है कि जब आप इन्हीं उपकरणों को अपने ऊपर लागू करते हैं, तो भीतर से प्रतिरोध उठता है, क्योंकि वहाँ द्रष्टा ही दृश्य बन जाता है। तभी बाहरी ईमानदारी के साथ-साथ आंतरिक ईमानदारी अनिवार्य हो जाती है। आप भीतर से कैसे भी हों, अच्छे वैज्ञानिक हो सकते हैं, पर अच्छे मनुष्य नहीं।"

--आईएएनएस

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