भारत ने राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन करने वाले प्रतिबंधों और पाबंदियों को खत्म करने की मांग की

भारत ने राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन करने वाले प्रतिबंधों और पाबंदियों को खत्म करने की मांग की

संयुक्त राष्ट्र, 11 जुलाई (आईएएनएस)। भारत ने आर्थिक पाबंदियों और प्रतिबंधों को खत्म करने की मांग की है और इन्हें आर्थिक और सामाजिक विकास में रुकावट और देशों की संप्रभुता का उल्लंघन बताया है।

भारत के स्थायी मिशन में काउंसलर एल्डोस मैथ्यू पुन्नूस ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा, "दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत बहुपक्षवाद को अपनी मूल आस्था मानता है।"

उन्होंने कहा कि प्रतिबंध और आर्थिक प्रतिबंध मानवाधिकारों के संरक्षण में बाधा डालते हैं। इससे विकास, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों के साथ-साथ विकास के अधिकार पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।

पुन्नूस ने कहा, "इसलिए हम अन्य देशों के साथ मिलकर ऐसे प्रतिबंधों को समाप्त करने की मांग करते हैं, जो प्रभावित देशों की आबादी, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों, के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं।"

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा सभी देशों से आग्रह कर चुकी है कि वे ऐसे कानूनों और उपायों को न तो लागू करें और न ही बनाए रखें, जिनका सीमापार (एक्स्ट्राटेरिटोरियल) प्रभाव अन्य देशों की संप्रभुता को प्रभावित करता हो।

उन्होंने आगे कहा, “साल दर साल, महासभा ने ऐसे कानूनों और नियमों को लागू करने से मना किया है जिनका असर दूसरे देशों पर पड़ता है, साथ ही दुनिया भर के लोगों की तरक्की और खुशहाली पर बुरा असर डालने वाले दूसरे तरह के दबाव वाले आर्थिक उपायों को भी मना किया है।”

पुन्नूस ने यह बयान महासभा में क्यूबा पर लगे कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के संदर्भ में दिया। दरअसल, महासभा में इस विषय पर हर साल चर्चा होती है, जिसके बाद वर्ष 1992 से लगातार इन प्रतिबंधों को हटाने की मांग करने वाले प्रस्ताव पारित किए जाते रहे हैं।

हाल ही में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने पर दूसरे प्रतिबंध लगाए थे, जिसका भारत को भी सामना करना पड़ा। हालांकि, अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप सरकार के इस प्रतिबंध को हटा दिया था। भारत ने हमेशा उन देशों के खिलाफ अपना पक्ष रखा है जो एकतरफा प्रतिबंध और रोक लगाते हैं।

एल्डोस मैथ्यू पुन्नूस ने कहा कि क्यूबा पर अमेरिका द्वारा लगाए गए एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र में बार-बार व्यक्त किए गए वैश्विक बहुमत के मत, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अमेरिका की जिम्मेदारियों के विपरीत हैं।

उन्होंने कहा कि इन प्रतिबंधों के बावजूद क्यूबा ने जरूरतमंद देशों में अपने चिकित्सा कर्मियों को भेजकर वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस योगदान को उचित मान्यता देनी चाहिए।

हालांकि पिछले कुछ सालों में इस रोक में कुछ ढील दी गई है और इसे और कड़ा किया गया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने क्यूबा के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा दबाव बनाने की रणनीति अपनाते हुए इसे और सख्त कर दिया है।

इस हफ्ते की शुरुआत में असेंबली में बोलते हुए अमेरिका के स्थायी प्रतिनिधि माइक वाल्ट्ज ने इस बात से इनकार किया कि कोई ब्लॉकेड या रोक है और क्यूबा को कई देशों से मिली मदद के जहाजों का हवाला दिया।

उन्होंने कहा, "क्यूबा पर अमेरिका की ओर से कोई नाकेबंदी (ब्लॉकेड) नहीं है। क्यूबा में असली प्रतिबंध तो वह गिलोटिन है, जिसे वहां की सरकार ने अपने ही लोगों के सिर पर लटका रखा है।"

उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका स्वयं क्यूबा को 10 करोड़ डॉलर (100 मिलियन डॉलर) की सहायता उपलब्ध करा रहा है और जरूरतमंद लोगों तक भोजन तथा दवाइयां पहुंचाने के लिए कैथोलिक चर्च के साथ मिलकर काम कर रहा है।

--आईएएनएस

केके/एएस