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बलूचों ने 'इंटरनेशनल इनफोर्समेंट डिसअपियरेंस डे' पर किया पीड़ितों को याद, पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की अपील

Baloch

क्वेटा, 31 अगस्त (आईएएनएस)। 'इंटरनेशनल इनफोर्समेंट डिसअपियरेंस डे' (जबरन गायब किए गए पीड़ितों के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस) पर बलूचिस्तान के कई मानवाधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं ने उन लोगों को याद किया जिन्हें पाकिस्तानी सेना ने उनके घरों, सड़कों और समुदायों से जबरन गायब कर दिया था। साथ ही, उन्होंने उन परिवारों के प्रति एकजुटता भी जताई जो बरसों से अपने प्रियजनों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया कि वे बच्चों, महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों सहित जबरन गायब किए गए हजारों बलूचों की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए सार्थक और प्रभावी कदम उठाएं।

हर साल 30 अगस्त को 'जबरन गायब किए गए पीड़ितों का अंतरराष्ट्रीय दिवस' मनाया जाता है। यह संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय किया गया दिन है, जिसे 2011 में मानवाधिकारों के इस गंभीर उल्लंघन के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाने और पीड़ितों व उनके परिवारों के सम्मान में शुरू किया गया था।

इस मौके पर, बलूचिस्तान की मानवाधिकार परिषद (एचआरसीबी) ने कहा कि जनवरी 2016 से जुलाई 2026 के बीच, उसके पास पूरे बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने के 9,130 ​​मामलों का रिकॉर्ड है।

एचआरसीबी ने कहा, "यह असल संख्या का एक छोटा सा हिस्सा है, क्योंकि कई इलाके सुरक्षा बलों के कड़े नियंत्रण में हैं, जिससे अनगिनत मामलों का रिकॉर्ड रखना मुश्किल हो जाता है। हर संख्या के पीछे एक मां अपने बेटे का इंतजार कर रही है, एक बच्चा अपने माता-पिता का इंतजार कर रहा है, एक पत्नी अपने पति का इंतजार कर रही है, और एक परिवार हर दिन अनिश्चितता के साथ जी रहा है।"

बलूच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (बीएसओ)-आजाद ने पाकिस्तानी बलों पर बलूचिस्तान के लोगों के खिलाफ "गैर-कानूनी कार्रवाई" करने का आरोप लगाया और कहा कि जबरन गायब करना इन अत्याचारों के सबसे प्रमुख रूपों में से एक है।

यह आरोप लगाते हुए कि राज्य ने अब विभिन्न तरीकों और नीतियों के माध्यम से इस चलन को सामान्य बना दिया है, संगठन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों से तत्काल कार्रवाई करने और इन "गंभीर अपराधों" के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने की मांग की।

बीएसओ ने एक्स पोस्ट में कहा, "2026 की छमाही बीत गई है। अब तक 800 से अधिक बलूच छात्र, राजनीतिक कार्यकर्ता, शिक्षक, डॉक्टर, मजदूर, दुकानदार और अन्य नागरिक पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियों द्वारा जबरन गायब किए जाने का शिकार हुए हैं। पीड़ितों में महिलाएं, लड़कियां, नाबालिग बच्चे, बुजुर्ग और युवा शामिल हैं। आठ साल से लेकर साठ साल तक के लोग इसमें शामिल हैं। यही नहीं, इसमें मस्तुंग के जाकिर नाम के डेढ़ साल के मासूम का मामला भी शामिल है।"

इस बीच, बलूच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) की नेता सबीहा बलूच ने कहा कि हालांकि यह दिन दुनिया भर में उन लोगों को याद करने के लिए मनाया जाता है जिन्हें जबरन गायब कर दिया गया है, लेकिन बलूच लोगों के लिए जबरन गायब किया जाना साल में एक बार याद करने का मुद्दा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सच्चाई है।

अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर सबीहा ने कहा, "बलोच परिवार हर दिन इस डर के साथ जीते हैं कि कहीं उनका कोई और अपना उठा न लिया जाए और गायब न कर दिया जाए। माताएं अपने बेटों का और बच्चे अपने पिता का इंतजार करते हैं। परिवार ऐसे जवाबों का इंतजार करते हैं जो शायद कभी न मिलें। बलोचिस्तान के लिए हर दिन जबरदस्ती गायब किए जाने की घटनाओं का दिन होता है। दुनिया को चुप नहीं रहना चाहिए, जबकि परिवार उम्मीद और असहनीय दर्द के बीच इंतजार कर रहे हैं।"

इस दिन के मौके पर, 'बलोच वॉयस फॉर जस्टिस' (बीवीजे) ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मानवाधिकारों की रक्षा की अपनी जिम्मेदारी निभाने, पाकिस्तानी अधिकारियों से जवाबदेही की मांग करने और बलोचिस्तान में लोगों को जबरदस्ती गायब करने की प्रथा को खत्म करने के प्रयासों का समर्थन करने का आग्रह किया।

--आईएएनएस

केआर/