वाशिंगटन, 12 जुलाई (आईएएनएस)। अमेरिका की अगुवाई में 12 देशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर 'मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत' के प्रति अपनी मजबूत प्रतिबद्धता दोहराई है। साथ ही सभी देशों ने नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन करते हुए दक्षिण चीन सागर पर वर्ष 2016 में आए ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फैसले को फिर से सही ठहराया।
यह संयुक्त बयान उस ऐतिहासिक फैसले की 10वीं वर्षगांठ पर जारी किया गया, जो 12 जुलाई 2016 को संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (यूएनसीएलओएस) के तहत गठित मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने सुनाया था। इस फैसले में चीन के दक्षिण चीन सागर पर व्यापक समुद्री दावों को कानूनी आधारहीन बताया गया था।
संयुक्त बयान पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, एस्टोनिया, जापान, लातविया, लिथुआनिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, रोमानिया, स्लोवेनिया और यूनाइटेड किंगडम ने हस्ताक्षर किए हैं।
इन देशों ने कहा कि वे 'एक शांतिपूर्ण, स्थिर, नियम-आधारित और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र' के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
बयान में कहा गया कि समुद्री विवादों का समाधान बल प्रयोग या दबाव के जरिए नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (यूएनसीएलओएस) के अनुसार शांतिपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए। देशों ने दोहराया कि 2016 का फैसला एक ऐतिहासिक और सर्वसम्मत निर्णय था, जो चीन और फिलीपींस के बीच समुद्री अधिकारों और दावों से जुड़े मामलों में अंतिम, कानूनी रूप से बाध्यकारी और निर्णायक है।
संयुक्त बयान में यह भी दोहराया गया कि न्यायाधिकरण ने साफ कहा था कि दक्षिण चीन सागर में चीन के व्यापक समुद्री दावों, खासकर तथाकथित 'ऐतिहासिक अधिकारों,' का अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कोई कानूनी आधार नहीं है।
इन देशों ने समुद्री और हवाई मार्गों की स्वतंत्र आवाजाही तथा समुद्र के अन्य वैध अंतरराष्ट्रीय उपयोगों को बनाए रखने के महत्व पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि यह सब यूएनसीएलओएस के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।
हालांकि बयान में किसी विशेष घटना का जिक्र नहीं किया गया, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर चिंता जताई गई। देशों ने कहा कि वे किसी भी ऐसे एकतरफा या अस्थिर करने वाले कदम का कड़ा विरोध करते हैं, जिसमें बल या दबाव का इस्तेमाल कर क्षेत्र की शांति और स्थिरता को खतरे में डाला जाए।
संयुक्त बयान में तटरक्षक बल, सैन्य जहाजों और समुद्री मिलिशिया के इस्तेमाल से दूसरे देशों की वैध समुद्री और हवाई गतिविधियों में बाधा डालने, डराने-धमकाने या उत्पीड़न करने की भी कड़ी आलोचना की गई। कहा गया कि ऐसी कार्रवाइयों से समुद्र में मौजूद कर्मियों और मछुआरों की सुरक्षा खतरे में पड़ती है और क्षेत्रीय शांति एवं सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ता है।
सभी देशों ने संबंधित पक्षों से 2016 के फैसले का सम्मान करने और बातचीत तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उपलब्ध वैध तरीकों से विवादों का शांतिपूर्ण समाधान निकालने की अपील की।
संयुक्त बयान में आसियान (एएसईएएन) के क्षेत्रीय दृष्टिकोण का भी समर्थन किया गया। देशों ने कहा कि वे दक्षिण चीन सागर को शांति, स्थिरता, सहयोग और समृद्धि का समुद्र बनाने के साझा उद्देश्य के साथ खड़े हैं, जहां वैध अंतरराष्ट्रीय व्यापार बिना किसी बाधा के आगे बढ़ सके।
दक्षिण चीन सागर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। इस क्षेत्र पर चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान पूरे या आंशिक दावे करते हैं। इन दावों को लेकर कई बार तटरक्षक और नौसैनिक जहाज आमने-सामने आ चुके हैं, जिससे यह इलाका हिंद-प्रशांत क्षेत्र का सबसे संवेदनशील रणनीतिक केंद्र बन गया है।
12 जुलाई 2016 को हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने फिलीपींस के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि चीन के 'ऐतिहासिक अधिकारों' का अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई आधार नहीं है। हालांकि चीन ने उस फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था और आज भी अपने दावों पर कायम है। वहीं अमेरिका और उसके कई सहयोगी देश लगातार इस फैसले का सम्मान करने और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने की वकालत करते रहे हैं।
--आईएएनएस
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