नई दिल्ली, 6 अगस्त (आईएएनएस)। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनका जीवन केवल उपलब्धियों का इतिहास नहीं होता, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत विचार बन जाता है। रवींद्रनाथ टैगोर ऐसे ही महापुरुष थे, जिन्होंने साहित्य, शिक्षा, समाज सुधार और मानवीय मूल्यों को एक साथ जोड़कर एक ऐसी दृष्टि दी, जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
1941 में 7 अगस्त को उनके निधन के साथ ही एक युग का अंत हुआ, लेकिन उनके विचार, उनकी संस्थाएं और उनका शिक्षा दर्शन आज भी समाज को दिशा दिखाती है।
रवींद्रनाथ टैगोर का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे महान साहित्यकार, समाज सुधारक, अध्यापक, कलाकार और संस्थाओं के निर्माता थे। उन्होंने न केवल सपने देखे, बल्कि उन्हें साकार करने के लिए कर्मयोगी की तरह कार्य किया। उनकी कालजयी सफलताओं ने भारतीयों में आत्मसम्मान का भाव जगाया। राष्ट्र की सीमाएं भी उनके विराट व्यक्तित्व को बांध नहीं सकीं। वे स्वयं को विश्व नागरिक मानते थे और उनका शिक्षा दर्शन सम्पूर्ण वसुधा के संरक्षण, विकास, सौंदर्य, सत्य और समस्त जीवों के कल्याण पर आधारित था।
6 मई 1861 को बंगाल के एक समृद्ध परिवार में जन्मे रवीन्द्रनाथ टैगोर को धर्मपरायणता, साहित्य और कला का संस्कार विरासत में मिला। वे महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर के सबसे छोटे पुत्र थे। देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 1863 में बोलपुर के पास एक आश्रम की स्थापना की थी, जो आगे चलकर रवीन्द्रनाथ टैगोर की कर्मस्थली बना। यहीं से शांति निकेतन, विश्वभारती और श्रीनिकेतन जैसी विश्व प्रसिद्ध संस्थाओं की नींव रखी गई।
समृद्ध परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनका विद्यालयी जीवन सुखद नहीं रहा। कलकत्ता के ओरिएंटल सेमेनरी और बाद में नार्मल स्कूल का वातावरण उन्हें रास नहीं आया। उन्होंने बाद में लिखा कि विद्यालय में प्रवेश करते ही उन्हें ऐसा लगा जैसे उनकी अपनी दुनिया उनसे छीन ली गई हो और उसकी जगह लकड़ी की बेंच और सीधी दीवारें उन्हें घूर रही हों। यही अनुभव आगे चलकर उनके शिक्षा दर्शन की आधारशिला बना। उन्होंने जीवनभर ऐसी शिक्षा व्यवस्था के लिए कार्य किया, जो बच्चों की प्रकृति, रुचि और आवश्यकताओं के अनुरूप हो।
शिक्षा सीमित रहने के बावजूद उन्होंने घर पर संस्कृत, बंगला, अंग्रेजी, संगीत और चित्रकला का अध्ययन निजी शिक्षकों से किया। 1878 में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए, लेकिन वहां भी अधिक समय तक नहीं रुके। 1881 में लॉ की पढ़ाई के उद्देश्य से फिर विलायत गए, लेकिन वकालत का विचार छोड़कर स्वदेश लौट आए। औपचारिक शिक्षा अधूरी रही, लेकिन पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों का प्रत्यक्ष अनुभव उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। 1901 में उन्होंने बोलपुर के निकट ब्रह्मचर्य आश्रम के नाम से विद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में शांति निकेतन कहा गया। इसके बाद उन्होंने स्वयं को शिक्षा, साहित्य और समाज सेवा के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया।
सक्रिय राजनीति में टैगोर को विशेष रुचि नहीं थी, लेकिन जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया तो उन्होंने स्वदेशी आंदोलन का नेतृत्व किया। वे कलकत्ता की गलियों में एकता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का संदेश लेकर निकले। 1919 में जालियांवाला बाग हत्याकांड के बाद उन्होंने अंग्रेजी सरकार द्वारा दी गई 'नाइटहुड' की उपाधि लौटा दी और पीड़ित भारतीयों के साथ खड़े हुए।
साहित्यकार के रूप में उनकी ख्याति निरंतर बढ़ती गई। 1913 में उनकी काव्य कृति 'गीतांजली' के लिए उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला और वे एशिया के पहले व्यक्ति बने जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ। इसके बाद पूरा विश्व उन्हें विश्वकवि के रूप में पहचानने लगा। गुरुदेव केवल साहित्यकार नहीं थे, बल्कि एक ऐसे शिक्षाशास्त्री भी थे, जिन्होंने शिक्षा के सिद्धांतों को व्यवहार में उतारा। उनकी शिक्षा संबंधी प्रमुख पुस्तकों में 'शिक्षा', 'शान्तिनिकेतन ब्रह्मचर्य आश्रम', 'आश्रम के रूप व विकास' और 'विश्वभारती' शामिल हैं। इसके अलावा, शिक्षा पर उनके सौ से अधिक निबंध और व्याख्यान प्रकाशित हुए, जिनका अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया।
टैगोर का जीवन दर्शन मानवता, करुणा, आत्मसम्मान और समन्वय पर आधारित था। उनका विश्वास था कि कोई भी नवनिर्माण ऐसा नहीं होना चाहिए, जिससे व्यक्ति या समाज के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचे या जीवन के आध्यात्मिक और सांसारिक पक्षों में दूरी पैदा हो। उन्होंने 1905 में 'स्वदेश समाज' निबंध लिखा, जिसमें कृषि, शिल्प और ग्रामोद्योग के पुनर्विकास पर बल दिया गया। इन्हीं विचारों को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने श्रीनिकेतन की स्थापना की, जहां आत्मसहायता और सहयोग के आधार पर सामुदायिक विकास का प्रयोग किया गया।
1924 में गरीब और अनाथ बच्चों के लिए 'शिक्षा सत्र' की स्थापना की गई। 1921 में शान्तिनिकेतन का विस्तार विश्वभारती विश्वविद्यालय के रूप में हुआ। यहां राष्ट्रीयता, धर्म, जाति और भाषा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। रवीन्द्रनाथ टैगोर विभिन्न संस्कृतियों के बीच सहयोग और समन्वय में विश्वास रखते थे। उनका उद्देश्य मानव को संकीर्ण सीमाओं से निकालकर 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना से जोड़ना था।
--आईएएनएस
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