'तमिलनाडु यौन उत्पीड़न के मामलों में तेजी लाने को एसओपी बनाने की योजना बना रहा', हाई कोर्ट ने सरकार से मांगी स्टेटस रिपोर्ट

'तमिलनाडु यौन उत्पीड़न के मामलों में तेजी लाने को एसओपी बनाने की योजना बना रहा', हाई कोर्ट ने सरकार से मांगी स्टेटस रिपोर्ट

चेन्नई, 22 जून (आईएएनएस)। मद्रास हाई कोर्ट को सोमवार को बताया गया कि तमिलनाडु सरकार महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की जांच, अभियोजन और मुकदमे की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) तैयार कर रही है।

एडवोकेट जनरल विजय नारायण ने चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की डिवीजन बेंच को बताया कि सरकार ने ऐसे मामलों के तेजी से निपटारे के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने को सबसे ज्यादा प्राथमिकता देने का फैसला किया है।

राज्य की ओर से पेश होते हुए एडवोकेट जनरल ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में अक्सर जांच के चरण में देरी होती है, क्योंकि फोरेंसिक साइंस रिपोर्ट, खासकर डीएनए एनालिसिस रिपोर्ट मिलने में समय लगता है। इस समस्या को हल करने के लिए, सरकार पूरे राज्य में डीएनए टेस्टिंग सुविधाओं का विस्तार करने की योजना बना रही है।

यह देखते हुए कि तमिलनाडु में कई क्षेत्रीय फोरेंसिक साइंस प्रयोगशालाओं में अभी डीएनए टेस्टिंग की क्षमता नहीं है, जिसके कारण जांच पूरी करने और चार्जशीट दाखिल करने में देरी होती है, उन्होंने कहा कि सरकार सबूतों की तेज प्रोसेसिंग और तेज जांच सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त सुविधाएं स्थापित करने और फोरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने का इरादा रखती है।

ये बातें एक 26 वर्षीय रेप सर्वाइवर द्वारा दायर रिट याचिका की सुनवाई के दौरान कही गईं, जिसमें उसने अपने मामले में ट्रायल की कार्यवाही शुरू होने में देरी को लेकर हाई कोर्ट से दखल की मांग की थी।

एडवोकेट जनरल के अनुसार, याचिकाकर्ता के साथ कथित तौर पर सितंबर 2025 में तिरुवन्नामलाई जिले में दो पुलिसकर्मियों ने रेप किया था। उन्होंने कोर्ट को बताया कि हाई कोर्ट के एक सिंगल जज ने 4 जून को आरोपियों द्वारा मामले से बरी होने के लिए दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

उन्होंने कहा कि उन याचिकाओं के खारिज होने के बाद, ट्रायल कोर्ट ने 17 जून को आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए और ट्रायल 24 जून से शुरू होना है।

एडवोकेट जनरल ने इस बात पर भी जोर दिया कि न्यायिक अधिकारियों को यौन अपराधों के मामलों में रोजाना ट्रायल करना चाहिए। उन्होंने हाई कोर्ट से आग्रह किया कि वे ट्रायल जजों को संवेदनशील बनाएं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कार्यवाही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 346(1) के तहत निर्धारित दो महीने की समय-सीमा के भीतर पूरी हो।

इन बातों पर ध्यान देते हुए, डिवीजन बेंच ने तमिलनाडु सरकार और मद्रास हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को दो सप्ताह के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। उम्मीद है कि इस रिपोर्ट में महिलाओं और बच्चों से जुड़े यौन अपराधों के लंबित मामलों का डेटा, साथ ही मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर और तेज जांच और ट्रायल सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी अतिरिक्त आवश्यकताओं का विवरण शामिल होगा।

--आईएएनएस

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