नई दिल्ली, 13 जून (आईएएनएस)। दिल्ली में शनिवार को ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के सदस्य राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) कार्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने एक प्रतिनिधिमंडल के रूप में ज्ञापन सौंपने का प्रयास किया। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने उन्हें गेट पर ही रोक दिया और एनटीए अधिकारियों से मिलने की अनुमति नहीं दी।
इस दौरान एसोसिएशन से जुड़े और पूर्व जेएनयूएसयू अध्यक्ष नितीश ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "सीयूईटी पीजी परीक्षा में कई अनियमितताओं को लेकर लगातार शिकायतें आ रही हैं। पहले एनटीए ने जो परीक्षा शेड्यूल जारी किया था, उसके अनुसार सभी परीक्षाएं एक ही शिफ्ट में 27 मार्च तक समाप्त होनी थीं। लेकिन बाद में कई परीक्षाएं 28, 29 और 30 मार्च को दो शिफ्टों में आयोजित की गईं, जिसकी जानकारी एनटीए की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है। कई सारे स्टूडेंट हैं जो उस शिफ्ट के हैं और वो टॉपर बन चुके हैं।"
उन्होंने सवाल उठाया कि जब परीक्षा दो शिफ्टों में आयोजित की गई, तो इसकी जानकारी वेबसाइट पर क्यों नहीं दी गई और नॉर्मलाइजेशन की प्रक्रिया क्या थी। उन्होंने यह भी पूछा कि किन छात्रों की परीक्षाएं दोबारा आयोजित की गईं और किन केंद्रों पर यह हुआ। प्रतिनिधिमंडल का उद्देश्य केवल एनटीए से इन सवालों पर स्पष्टता प्राप्त करना था, लेकिन उन्हें मिलने नहीं दिया गया।
नितीश ने आरोप लगाया कि एनटीए बार-बार ईमेल का जवाब नहीं देता और अपॉइंटमेंट के बिना मिलने से मना कर दिया जाता है। संस्था पर पहले भी कई सवाल उठ चुके हैं, जिनमें नीट पेपर लीक, सीयूईटी यूजी में तकनीकी गड़बड़ियां और सीबीएसई ओएमआर शीट से जुड़े मामले शामिल हैं। यदि एनटीए को पारदर्शी बनना है, तो उसे छात्रों के सवालों का जवाब देना होगा और अपनी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लानी होगी।
एक अन्य छात्र प्रतिनिधि नेविल ने कहा कि सीयूईटी पीजी परीक्षा में कई असंगतियां देखने को मिली हैं। पॉलिटिकल साइंस जैसे विषयों के पेपर अलग-अलग दिनों में दोहराए गए, जबकि परीक्षा कार्यक्रम के अनुसार यह 27 तारीख तक समाप्त होनी थी, लेकिन इसे 30 तारीख तक बढ़ा दिया गया। डेट शीट के उल्लंघन और प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर वे एनटीए से जवाब मांगने आए थे, लेकिन उन्हें मिलने से रोक दिया गया।
नेविल ने यह भी सवाल उठाया कि एनटीए एक पंजीकृत संस्था है, फिर भी कार्यालय के बाहर भारी पुलिस बल क्यों तैनात किया गया है। छात्रों की समस्याओं को सुनने के बजाय उन्हें रोका जाना गंभीर चिंता का विषय है।