रांची, 25 जून (आईएएनएस)। झारखंड ने ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में गुरुवार को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है। रामगढ़ जिले स्थित पतरातू विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (पीवीयूएनएल) की 800 मेगावाट क्षमता वाली दूसरी यूनिट का कॉमर्शियल ऑपरेशन बुधवार-गुरुवार की दरमियानी रात शुरू हो गया है। इसके साथ ही झारखंड बिजली उत्पादन और उपलब्धता के मामले में न सिर्फ आत्मनिर्भर हो गया है, बल्कि अधिशेष (सरप्लस) बिजली वाले राज्यों की श्रेणी में पहुंच गया है।
पीवीयूएनएल की इस नई इकाई से उत्पादित 800 मेगावाट बिजली में से 85 प्रतिशत यानी 680 मेगावाट बिजली झारखंड को मिलेगी। इससे पहले नवंबर 2025 में शुरू हुई पहली 800 मेगावाट इकाई से भी राज्य को 680 मेगावाट बिजली मिल रही है। दोनों इकाइयों के चालू होने के बाद अब केवल पतरातू परियोजना से ही झारखंड को 1,360 मेगावाट बिजली उपलब्ध होगी।
ऊर्जा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में वर्तमान समय में औसत बिजली मांग करीब 3,000 मेगावाट है। दूसरी ओर पतरातू परियोजना की दो इकाइयों सहित अन्य उपलब्ध स्रोतों को मिलाकर झारखंड के पास अब लगभग 3,885 मेगावाट बिजली उपलब्ध है। इसका अर्थ है कि राज्य के पास अपनी जरूरत से लगभग 600 मेगावाट अधिक बिजली होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि नॉन-पीक आवर में इस अतिरिक्त बिजली की बिक्री कर राज्य अतिरिक्त राजस्व भी अर्जित कर सकेगा। पतरातू विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड, देश की अग्रणी बिजली कंपनी एनटीपीसी और झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड (जेबीवीएनएल) का संयुक्त उपक्रम है। इसमें एनटीपीसी की 74 प्रतिशत और जेबीवीएनएल की 26 प्रतिशत हिस्सेदारी है। परियोजना का दीर्घकालिक लक्ष्य 4,000 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता विकसित करना है। पहले चरण में 2,400 मेगावाट क्षमता की तीन इकाइयों का निर्माण किया जा रहा है। इनमें से दो इकाइयां चालू हो चुकी हैं, जबकि तीसरी इकाई के अगले कुछ महीनों में शुरू होने की संभावना है।
इस परियोजना की एक विशेषता यह भी है कि इसे अत्याधुनिक सुपरक्रिटिकल तकनीक से विकसित किया गया है। पर्यावरणीय प्रभाव कम करने के लिए एयर-कूल्ड कंडेंसर और 100 प्रतिशत ड्राई ऐश हैंडलिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। संयंत्र के लिए आवश्यक कोयला लातेहार के बनहर्दीह कोल ब्लॉक से और पानी पतरातू डैम से उपलब्ध कराया जा रहा है।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि इस परियोजना से राज्य के सभी जिलों में बिजली आपूर्ति व्यवस्था को मजबूती मिलेगी। राज्य को महंगी दरों पर बाहरी स्रोतों से बिजली खरीदने की जरूरत भी कम होगी। साथ ही उद्योगों को स्थिर और निर्बाध बिजली मिलने से निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।