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चुनावी मुद्दे और गठबंधन के सहारे नई रणनीति गढ़ने में जुटे राहुल गांधी

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नई दिल्ली, 21 अगस्त (आईएएनएस)। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी इन दिनों एक ओर चुनावी मुद्दों को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं, तो दूसरी ओर आगामी विधानसभा चुनावों से पहले विपक्षी गठबंधनों को मजबूत करने की कोशिशों में जुटे हैं। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को संसद से लेकर संसद मार्ग थाने तक ले जाकर उन्होंने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने का प्रयास किया है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने छात्रों पर पुलिस बर्बरता के आरोपों से इनकार किया है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले की जांच के लिए गठित पांच सदस्यीय समिति का हवाला दिया है। इसके बावजूद राहुल गांधी लगातार इस मुद्दे को उठाकर कांग्रेस को लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने वाली पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

कांग्रेस की रणनीति केवल मुद्दों तक सीमित नहीं है। पार्टी आगामी चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों के साथ गठबंधन को भी अहम हथियार मान रही है। लगातार चुनावी हार के बाद कांग्रेस के लिए मुद्दे और गठबंधन दोनों ही राजनीतिक अस्तित्व से जुड़े सवाल बन गए हैं।

पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। हालांकि महागठबंधन के सहयोगी दलों ने इस मुद्दे को अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। चुनाव परिणामों में भी विपक्ष को निराशा हाथ लगी और एनडीए पहले से अधिक बहुमत के साथ सत्ता में लौट आया।

अब उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए राहुल गांधी छात्र आंदोलन और कथित पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को प्रमुख राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। कांग्रेस का मानना है कि युवाओं से जुड़े भावनात्मक मुद्दे सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करने में मदद कर सकते हैं।

कांग्रेस लंबे समय से अपनी राजनीतिक विरासत को वोटों में बदलने के लिए संघर्ष कर रही है। लगातार चुनावी हार ने पार्टी की स्थिति को और कमजोर किया है। ऐसे में आने वाले चुनाव कांग्रेस के लिए केवल सीटें जीतने का नहीं, बल्कि लगातार हार की धारणा को तोड़ने का भी मौका माने जा रहे हैं।

इसी रणनीति के तहत कांग्रेस गठबंधन राजनीति पर भी ज्यादा जोर दे रही है। बिहार के अनुभव के बाद पार्टी ने सहयोगी दलों के साथ बेहतर तालमेल के लिए समन्वय समितियों के गठन की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं, ताकि सीट बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर अंतिम समय में विवाद न हो।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक माना जाता है। कभी राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकत रही कांग्रेस अब क्षेत्रीय दलों और भाजपा के बीच सीमित भूमिका में सिमट गई है। ऐसे में पार्टी छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई और राम जन्मभूमि ट्रस्ट में कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन मिला था। अब राहुल गांधी और अखिलेश यादव की संभावित चुनावी साझेदारी भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल, जातीय और सामाजिक समीकरणों के सहारे आगामी चुनावों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद लगाए हुए है।

--आईएएनएस

डीएससी