नालंदा विश्वविद्यालय ने शास्त्रार्थ की हमारी प्राचीन परंपरा को फिर से जीवंत किया : पीएम मोदी

नालंदा विश्वविद्यालय ने शास्त्रार्थ की हमारी प्राचीन परंपरा को फिर से जीवंत किया : पीएम मोदी

नई दिल्ली, 28 जून (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार सुबह 11 बजे अपने लोकप्रिय मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के 135वें एपिसोड के माध्यम से देशवासियों और दुनियाभर में बसे भारतीयों को संबोधित किया। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने नालंदा विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का भी जिक्र किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय ने शास्त्रार्थ की हमारी प्राचीन परंपरा को फिर से जीवंत किया है। शास्त्रार्थ केवल अपनी बात रखने का माध्यम नहीं है। ये वाद-संवाद और मंथन की एक अनुशासित प्रक्रिया है। इसमें तर्क के साथ, तथ्य के साथ, अपनी बात कहना बहुत जरूरी होता है और उसमें आपकी महारत होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि दूसरों के विचारों को धैर्य से सुनने और समझने की सीख भी इस शास्त्रार्थ की प्रक्रिया से मिलती है। मुझे खुशी है कि नालंदा विश्वविद्यालय ने इसे अपने दीक्षांत समारोह का हिस्सा बनाया।

इससे पहले 19 जून 2024 को भी बिहार के राजगीर में नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि नालंदा केवल एक नाम नहीं है, यह एक पहचान है, एक सम्मान है। नालंदा मूल है और मंत्र भी है। नालंदा इस सत्य का उद्घोष है कि ज्ञान नष्ट नहीं हो सकता, भले ही पुस्तकें आग में जल जाएं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि नवीन नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना भारत के स्वर्ण युग का शुभारंभ करेगी।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि नालंदा के प्राचीन अवशेषों के निकट इसका पुनरुद्धार विश्व को भारत की क्षमताओं से परिचित कराएगा। इससे विश्व को यह जानकारी मिलेगी कि प्रबल मानवीय मूल्यों वाले राष्ट्र, इतिहास का कायाकल्प करके एक बेहतर विश्व का निर्माण करने में सक्षम हैं।

उन्होंने कहा था नालंदा में विश्व, एशिया और कई देशों की विरासत समाहित है और इसका पुनरुद्धार सिर्फ भारतीय पहलुओं के पुनरुद्धार तक सीमित नहीं है।

वहीं, प्रधानमंत्री ने केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का जिक्र करते हुए कहा कि दिल्ली में स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा साइंस में बीटेक प्रोग्राम शुरू करने जा रही है। ये आधुनिक टेक्नोलॉजी को भारत के पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे भारतीय भाषाओं के लिए नए अल टूल्स तैयार करने में मदद मिलेगी। हमारे प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में संरक्षित करने के काम को भी नई गति मिलेगी।

--आईएएनएस

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