मध्य प्रदेश : हाई कोर्ट में फतवे के आधार पर तलाक घोषित करने की मांग वाली याचिका खारिज

मध्य प्रदेश : हाई कोर्ट में फतवे के आधार पर तलाक घोषित करने की मांग वाली याचिका खारिज

भोपाल/जबलपुर, 6 अगस्त (आईएएनएस)। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी मदरसा या धार्मिक संस्थान से जारी फतवे के आधार पर ही तलाक की घोषणा नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसा फतवा सिर्फ इस्लामिक धर्मग्रंथों के अनुसार स्थिति को स्पष्ट करता है और इससे शादी अपने-आप खत्म नहीं होती।

एक महिला की सिविल रिविजन याचिका को मंजूरी देते हुए, जस्टिस विवेक जैन की सिंगल-जज बेंच ने उसके पति द्वारा फैमिली कोर्ट में दायर उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें भोपाल की दारुल-इफ्ता मस्जिद कमेटी से जारी फतवे के आधार पर तलाक की मांग की गई थी।

पति ने 29 अक्टूबर, 2024 के फतवे के आधार पर अपनी शादी खत्म होने की घोषणा की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका का विरोध करते हुए, पत्नी ने तर्क दिया कि मदरसा या धार्मिक संस्थान को तलाक देने का कोई अधिकार नहीं है और फतवे में केवल उन परिस्थितियों का जिक्र किया गया है, जिनमें इस्लामी कानून के तहत तलाक मांगा जा सकता है।

पत्नी के तर्क से सहमत होते हुए, हाई कोर्ट ने कहा कि फतवे से शादी अपने आप खत्म नहीं होती। जस्टिस जैन ने कहा, "कोर्ट ने उक्त फतवे को देखा है और उसमें कहीं भी तलाक देने का जिक्र नहीं है। असल में कोई भी धार्मिक संस्थान किसी मुस्लिम पुरुष को तलाक का अधिकार नहीं दे सकता।"

आदेश में आगे कहा गया, "उक्त फतवे में केवल इस्लामी धर्मग्रंथों के उन प्रावधानों का जिक्र है जो ऐसी स्थिति में मार्गदर्शन देते हैं, जब पत्नी का व्यवहार क्रूर हो।"

हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे फतवे के आधार पर तलाक की घोषणा नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी देखा कि पति ने इस गलतफहमी में मुकदमा दायर किया था कि नियमित तलाक याचिका दायर नहीं की जा सकती।

तलाक की घोषणा की मांग करने वाले मुकदमे को खारिज करते हुए, आदेश में स्पष्ट किया गया कि मुस्लिम पति के पास कानूनी उपाय मौजूद हैं और वह कानून के अनुसार फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर कर सकता है।

डिविजन बेंच के पहले के फैसले का हवाला देते हुए, हाई कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पुरुषों द्वारा तलाक की कार्यवाही शुरू करने की वैधता का मुद्दा अब कोई नया या अनसुलझा मुद्दा नहीं है।

पिछले फैसले में कहा गया था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ी कार्यवाही फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत फैमिली कोर्ट में की जा सकती है और शादी खत्म करने के लिए किसी मुस्लिम पुरुष को न्यायिक मंच तक पहुंचने से नहीं रोका जा सकता।

अपने आदेश में, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कानून के तहत तलाक की डिक्री मांगने और केवल धार्मिक राय के आधार पर घोषणा मांगने के बीच अंतर स्पष्ट किया।

जस्टिस जैन ने कहा, "तलाक का मुकदमा दायर किया जा सकता है, लेकिन फतवे के आधार पर तलाक की घोषणा नहीं की जा सकती। यह मानते हुए कि शिकायत में कार्रवाई का कोई वैध कानूनी आधार नहीं बताया गया है, हाई कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता के ऑर्डर 7 नियम 11 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इसे खारिज कर दिया।

--आईएएनएस

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