नई दिल्ली/इंफाल, 27 जून (आईएएनएस)। मणिपुर की 21 नागा जनजातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली शीर्ष संस्था, यूनाइटेड नागा काउंसिल (यूएनसी) ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार से अपील की कि वे मणिपुर, खासकर नागा-बहुल इलाकों में तेजी से बिगड़ती सुरक्षा स्थिति में तुरंत दखल दें।
यूएनसी, नागा महिला संघ और ऑल नागा स्टूडेंट्स एसोसिएशन, मणिपुर ने प्रधानमंत्री को एक संयुक्त ज्ञापन सौंपा। इसमें उन्होंने कुकी उग्रवादी समूहों द्वारा नागाओं के खिलाफ छेड़े गए 'प्रॉक्सी वॉर' (छद्म युद्ध) के खिलाफ तुरंत दखल देने की मांग की। ये कुकी समूह अभी सरकार के साथ 'सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स' (एसओ) समझौते के तहत हैं।
नागा संगठनों का दावा है कि कुकी उग्रवादी समूह और म्यांमार स्थित केएनए(बी) न केवल 3 अगस्त, 2015 को हुए इंडो-नागा फ्रेमवर्क समझौते का उल्लंघन कर रहे हैं, बल्कि भारत की पूर्वी सीमा की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं।
यूएनसी के अध्यक्ष एन.जी लोर्हो और अन्य वरिष्ठ नागा नेता, वरेयो शत्सांग, सैमसन रेमेई, ए.सी. थोत्सो, के.एस. पॉल लियो और एल. अदाणी, दिल्ली में राजनीतिक नेताओं, नागरिक समाज संगठनों, महिला समूहों, शांति कार्यकर्ताओं, जागरूक नागरिकों और मीडिया के साथ कई बैठकें कर रहे हैं। वे नागाओं का पक्ष रखना चाहते हैं और तुरंत संवैधानिक और राजनीतिक दखल की मांग कर रहे हैं।
नागा संगठनों का यह कदम तब उठाया गया जब कुकी-जो काउंसिल (केजेडसी) ने 25 जून को मणिपुर के कांगपोकपी जिले में 13 मई को छह नागा बंधकों की हत्या को 'गंभीर गलती' बताते हुए उस पर खेद जताया।
यूएनसी ने कहा कि हालिया हिंसा के दौर के बाद यह पहली बार था जब मणिपुर के नागा बुजुर्गों ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय मीडिया को संबोधित किया। उनका आरोप है कि इस हिंसा ने सीधे तौर पर नागा लोगों और उनकी पुश्तैनी जमीनों को खतरे में डाल दिया है।
संगठन ने कहा कि ये घटनाएं तब हुईं जब राज्य मई 2023 में शुरू हुए मैतेई-कुकी जातीय संघर्ष से उबरने के लिए संघर्ष कर रहा था। उन्होंने दावा किया कि हाल की घटनाएं नागा लोगों और शांति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के खिलाफ एक गहरी साजिश को दर्शाती हैं। नागा संगठनों ने नागरिकों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में राज्य और केंद्र सरकार की क्षमता पर भी सवाल उठाए।
यूएनसी ने कहा कि इस साल 13 मई को तीन थाडो चर्च नेताओं की हत्या के बाद, कुकी उग्रवादी समूहों ने कथित तौर पर लेइलोन वाइफेई और सपरमाइना कुकी गांवों से 20 नागा नागरिकों का अपहरण कर लिया था। उनमें से 14 को 15 मई को रिहा कर दिया गया, जबकि छह अभी भी लापता हैं, बावजूद इसके कि यूएनसी ने उनकी रिहाई सुनिश्चित करने के लिए मणिपुर सरकार से बार-बार अपील की और समय भी दिया। यूएनसी ने कहा कि 10 जून को, यूएनसी और सेनापति के नागा पीपल्स ऑर्गनाइजेशन की मदद से नागा विलेज गार्ड्स ने लोगों के भारी गुस्से के बावजूद, मानवीय आधार पर 14 कुकी कैदियों को रिहा कर दिया। हालांकि, अगले ही दिन (11 जून) लापता छह नागा नागरिकों के शव बुरी तरह क्षत-विक्षत हालत में मिले।
यूएनसी ने इन हत्याओं को बेहद दुखद बताया और कहा कि इस घटना ने मासूम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की सरकार की क्षमता पर लोगों के भरोसे को बुरी तरह हिला दिया है। काउंसिल ने छह नागा नागरिकों के अपहरण और हत्या की एक तय समय-सीमा वाली, स्वतंत्र और कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की।
इसने सभी नागा-बहुल इलाकों, खासकर उन संवेदनशील इलाकों के लिए ठोस सुरक्षा गारंटी की भी मांग की, जहां नागरिकों को कथित तौर पर डराने-धमकाने, बंधक बनाने और सशस्त्र घुसपैठ का सामना करना पड़ा है।
यूएनसी का कहना है कि मौजूदा कांगपोकपी जिले के बड़े हिस्से ऐतिहासिक रूप से जेलियांगरोंग नागाओं की पुश्तैनी जमीन हैं और उसने ज़ोर देकर कहा कि इन इलाकों में किसी भी तरह की हिंसा, सैन्य ताकत का प्रदर्शन या आबादी से जुड़ी डराने-धमकाने की कार्रवाई को नागा सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के गंभीर मुद्दे के तौर पर देखा जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री को सौंपे गए अपने ज्ञापन का जिक्र करते हुए, काउंसिल ने तर्क दिया कि इस स्थिति को सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा या आंतरिक सांप्रदायिक संघर्ष के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
--आईएएनएस
एससीएच






