बेंगलुरू, 18 अगस्त (आईएएनएस)। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने मंगलवार को केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वो खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर पुनर्विचार करे। उन्होंने इस विधेयक से जुड़े प्रावधानों पर चिंता जाहिर की। इस प्रावधान के तहत राज्य की उस संवैधानिक शक्ति को प्रतिबंधित करने का काम करता है, जिसके तहत खनिज अधिकार और खनिज युक्त भूमि पर कर लगाया गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी को लिखे पत्र में परमेश्वर ने विधेयक से जुड़े प्रावधानों पर आपत्ति जताई। उन्होंने मांग की कि इस बिल पर पुनर्विचार किया जाए।
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसने खनिज युक्त भूमि और खनिज अधिकारों पर कराधान से संबंधित राज्य सूची की प्रविष्टियों 49 और 50 के तहत राज्यों की विधायी और वित्तीय शक्तियों की पुष्टि की थी।
परमेश्वर ने कहा कि केंद्र सरकार का एकतरफा दृष्टिकोण राष्ट्र से जुड़े संघवाद के ढांचे को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने इसे लेकर सभी राज्य सरकार से अर्थपूर्ण परामर्श की मांग की। उन्होंने सवैधानिक राजकोषीय शक्तियों को प्रभावित करने से पहले इस परामर्श की मांग की गई है।
परमेश्वर ने चेतावनी दी कि अधिनियम के प्रावधान खनिज उत्पादक राज्यों की संवैधानिक वित्तीय स्वायत्तता को कमजोर कर सकते हैं। खनिज अधिकारियों और खनिज भूमि पर कर लगाने से पहले परमेश्वर ने इसे लेकर सभी राज्य सरकारों से संरचनात्मक और समयबद्ध परामर्श की मांग की।
उन्होंने केंद्र से खनिज कराधान के संवैधानिक, वित्तीय, आर्थिक, पर्यावरणीय और निवेश संबंधी प्रभावों की जांच करने के लिए एक केंद्र-राज्य परामर्श तंत्र स्थापित करने का भी आग्रह किया।
परमेश्वर ने बताया, "एमएमडीआर अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन का सीधा प्रभाव न केवल राजस्व के एक सैद्धांतिक भविष्य के स्रोत पर पड़ेगा, बल्कि उस विधायी क्षेत्र पर भी पड़ेगा जिसका प्रयोग राज्य विधानमंडल देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्पष्ट की गई संवैधानिक स्थिति के अनुसार पहले ही कर चुका है।"
उपमुख्यमंत्री ने तर्क दिया कि इस मुद्दे को भारत की बदलती राजकोषीय संघीय संरचना के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद राज्यों ने कराधान संबंधी महत्वपूर्ण शक्तियां छोड़ दी हैं, जबकि सार्वजनिक अवसंरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पेयजल, कृषि, शहरीकरण और कल्याणकारी कार्यक्रमों जैसे क्षेत्रों में उनकी जिम्मेदारियां लगातार बढ़ रही हैं।
उन्होंने कहा, "राज्यों पर वित्तीय संसाधनों की कमी के साथ-साथ बढ़ती जिम्मेदारियां भी बढ़ रही हैं।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि खनिज उत्पादक राज्यों को खनन से जुड़ी पर्याप्त सामाजिक, पर्यावरणीय और बुनियादी ढांचागत लागत भी वहन करनी पड़ती है।
इसके अलावा, एक पूर्वानुमानित खनिज कराधान ढांचे की मांग करते हुए परमेश्वर ने कहा कि अत्यधिक या विकृत कराधान संबंधी चिंताओं को परामर्श और तर्कसंगत सीमाओं के माध्यम से दूर किया जा सकता है, जबकि महत्वपूर्ण खनिजों से संबंधित राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को राज्यों की राजकोषीय आवाज को समाप्त किए बिना भी संरक्षित किया जा सकता है।
उन्होंने आगे चेतावनी दी कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसके दायरे को स्पष्ट करने के तुरंत बाद संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त कराधान क्षेत्र को सीमित करने से खनिज कराधान से परे एक मिसाल कायम हो सकती है।
उन्होंने कहा, "केंद्र सरकार को न केवल इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या संसद के पास कोई शक्ति है, बल्कि इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि सहकारी संघवाद की भावना के भीतर उस शक्ति का प्रयोग कैसे किया जाना चाहिए।"
परमेश्वर ने केंद्र सरकार को पांच उपायों पर विचार करने का प्रस्ताव दिया: एमएमडीआर संशोधन विधेयक को उसके वर्तमान स्वरूप में वापस लेना; राज्य सरकारों के साथ संरचित परामर्श करना; एक केंद्र-राज्य परामर्श तंत्र स्थापित करना; कर्नाटक के 2024 खनिज अधिकार और खनिज युक्त भूमि कर विधेयक सहित मौजूदा और प्रस्तावित राज्य कानूनों को ध्यान में रखना और एक सर्वसम्मति-आधारित राष्ट्रीय ढांचा विकसित करना जो राज्यों की संवैधानिक वित्तीय स्वायत्तता को समाप्त किए बिना निवेश, खनिज विकास और महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा की रक्षा करे।
परमेश्वर ने कहा, “एक विकसित भारत के लिए विकसित राज्यों की आवश्यकता है। एक आत्मनिर्भर भारत के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर राज्यों की आवश्यकता है और सहकारी संघवाद के लिए ऐसे राज्यों की आवश्यकता है, जो सशक्त भागीदार हों, न कि आर्थिक रूप से निर्भर कार्यान्वयन एजेंसियां।”
--आईएएनएस
एसएचके/वीसी







