एनडीपीएस मामलों में समयबद्ध जांच और त्वरित सुनवाई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को जारी किया नोटिस

एनडीपीएस मामलों में समयबद्ध जांच और त्वरित सुनवाई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को जारी किया नोटिस

नई दिल्ली, 10 अगस्त (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया। याचिका में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस अधिनियम से जुड़े मामलों की समयबद्ध जांच और त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने की मांग की गई है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहन की पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।

याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे एनडीपीएस अधिनियम, 1985 के तहत दर्ज सभी मामलों में फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट जमा करने के लिए अनिवार्य समय-सीमा तय करें। साथ ही, कम और मध्यम मात्रा के मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में तलाशी, जब्ती और नमूना लेने के लिए एकसमान मानक संचालन प्रक्रिया बनाई जाए।

याचिका में यह भी मांग की गई है कि न्यू साइकोएक्टिव सब्सटेंसेस की पहचान और उन्हें समय पर सूचीबद्ध करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई जाए। इसके अलावा, एनडीपीएस अधिनियम की धारा 36 और 36ए के तहत विशेष अदालतों के गठन तथा मादक पदार्थों से जुड़े मामलों की समयबद्ध जांच और त्वरित सुनवाई के लिए एक समान एसओपी तैयार करने की मांग की गई है।

याचिका के अनुसार, जांच के लिए एक समान मानकों, समयबद्ध फॉरेंसिक जांच और प्रभावी निगरानी की कमी के कारण मादक पदार्थों से जुड़े मामलों की जांच और अभियोजन में देरी हो रही है। इससे प्रक्रिया संबंधी त्रुटियां बढ़ रही हैं और अलग-अलग राज्यों में कानून का असमान तरीके से पालन हो रहा है।

याचिका में एनडीपीएस मामलों में तलाशी, जब्ती, नमूना लेने और इन्वेंट्री तैयार करने की प्रक्रिया की अनिवार्य डिजिटल रिकॉर्डिंग और वीडियोग्राफी की भी मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने कहा कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और प्रक्रिया संबंधी कमियों के कारण बरी होने के मामलों को रोका जा सकेगा।

याचिका में नशा मुक्ति और पुनर्वास केंद्रों की स्थापना और संचालन की भी मांग की गई है। साथ ही, एनडीपीएस अधिनियम की धारा 39 और 64ए के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया गया है, जो स्वेच्छा से नशामुक्ति उपचार लेने वाले कुछ नशा पीड़ितों को उपचार और अभियोजन से राहत का प्रावधान देती हैं।

इसके अलावा, याचिका में ऐसी सजा नीति बनाने की मांग की गई है, जिसमें ड्रग तस्करों और वित्तपोषकों को कड़ी सजा मिले जबकि नशा पीड़ितों और व्यक्तिगत उपयोग से जुड़े मामलों में अलग दृष्टिकोण अपनाया जाए।

याचिकाकर्ता ने उपयुक्त मामलों में लगातार सजा देने पर भी विचार करने की मांग की है। साथ ही, ड्रग तस्करों, वित्तपोषकों और मादक पदार्थों के कारोबार में शामिल लोगों की संपत्तियों का समयबद्ध आकलन और जब्ती करने की मांग की गई है। इसके लिए एनडीपीएस अधिनियम, धन शोधन निवारण अधिनियम, बेनामी संपत्ति कानून, ब्लैक मनी कानून और अन्य संबंधित कानूनों का हवाला दिया गया है।

याचिका में कहा गया है कि नशे की समस्या केवल अपराधियों और पीड़ितों तक सीमित नहीं है बल्कि इसका असर जनस्वास्थ्य, परिवार व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ता है। इसमें नशीली दवाओं से होने वाली मौतों, नशे के कारण होने वाली हिंसा और सीमा क्षेत्रों में ड्रोन के जरिए कथित तस्करी जैसी घटनाओं का उल्लेख किया गया है।

याचिका के अनुसार, 2025 में ड्रग्स से जुड़े मामलों में 53 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस दौरान 1,48,063 मामले दर्ज हुए और 1,240 टन मादक पदार्थ जब्त किए गए। ये आंकड़े नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के हवाले से दिए गए हैं।

याचिका में सिंथेटिक ओपिओइड सहित न्यू साइकोएक्टिव सब्सटेंसेस (एनपीएस) के बढ़ते प्रसार और उनकी समय पर पहचान तथा सूचीबद्ध करने के लिए स्थायी व्यवस्था की कमी पर भी चिंता जताई गई है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि नशे की बढ़ती समस्या और जांच, अभियोजन, पुनर्वास तथा कानून लागू करने की व्यवस्था में कमियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती हैं। साथ ही यह सरकार की अनुच्छेद 47 के तहत जिम्मेदारियों से भी जुड़ा विषय है।

याचिका में विधि आयोग को इस विषय पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारों से जांच, फॉरेंसिक परीक्षण, संपत्ति की पहचान, अभियोजन और पुनर्वास व्यवस्था को मजबूत करने के लिए संयुक्त कदम उठाने का अनुरोध किया गया है।

--आईएएनएस

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