डीएमके विधायक मार्कंडेयन की रिमांड के खिलाफ याचिका पर तत्काल सुनवाई को मद्रास हाईकोर्ट तैयार

डीएमके विधायक मार्कंडेयन की रिमांड के खिलाफ याचिका पर तत्काल सुनवाई को मद्रास हाईकोर्ट तैयार

चेन्नई, 23 जुलाई (आईएएनएस)। मद्रास हाईकोर्ट ने गुरुवार को विलाथिकुलम से डीएमके विधायक जी.वी. मार्कंडेयन की उस याचिका पर तत्काल सुनवाई के लिए सहमति दे दी, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री विजय को कथित तौर पर धमकी देने वाले बयान के मामले में अपनी न्यायिक रिमांड को चुनौती दी है।

न्यायमूर्ति जी.के. इलंथिरैयन ने विधायक के वकील की ओर से मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग किए जाने पर इसे लंच-मोशन के दौरान सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया।

याचिका में 20 जुलाई को तूतीकोरिन की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा पारित रिमांड आदेश को रद्द करने और विधायक को जमानत पर रिहा करने की मांग की गई है।

जी.वी. मार्कंडेयन को तूतीकोरिन जिला अपराध शाखा (डीसीबी) ने उस शिकायत के आधार पर गिरफ्तार किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने एक सार्वजनिक सभा के दौरान कहा था कि डीएमके विधायक विधानसभा के अंदर मुख्यमंत्री विजय की "हड्डियां तोड़ देंगे"।

गिरफ्तारी के बाद से विधायक 20 जुलाई से न्यायिक हिरासत में हैं और उन्हें 3 अगस्त तक रिमांड पर भेजा गया है।

हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में मार्कंडेयन ने कहा कि उनकी गिरफ्तारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत उपलब्ध कानूनी सुरक्षा प्रावधानों का उल्लंघन है।

उन्होंने दलील दी कि पुलिस ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उन्हें गिरफ्तार करना क्यों जरूरी था, जबकि बीएनएसएस की धारा 41ए के तहत नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता था। यह प्रावधान उन मामलों में लागू होता है, जहां तत्काल गिरफ्तारी आवश्यक नहीं होती।

याचिका में यह भी कहा गया है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों में अधिकतम सात वर्ष की सजा का प्रावधान है। ऐसे मामलों में केवल इसी आधार पर गिरफ्तारी उचित नहीं मानी जा सकती।

मार्कंडेयन का आरोप है कि जांच एजेंसी ने न्यायिक रिमांड की मांग करते समय मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसा कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया, जिससे गिरफ्तारी की आवश्यकता साबित होती हो।

उन्होंने अपनी दलील के समर्थन में अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) और सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई (2022) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों में कहा गया है कि सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में, यदि कोई विशेष परिस्थिति न हो, तो पुलिस को गिरफ्तारी के बजाय पहले नोटिस जारी करना चाहिए।

यह मामला 18 जुलाई को कोविलपट्टी स्थित कृष्णन मंदिर के पास आयोजित डीएमके की एक जनसभा में विधायक के भाषण से जुड़ा है। इस संबंध में एस. बालासुब्रमणियन ने 19 जुलाई को शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायत के आधार पर डीसीबी ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 351(3) (आपराधिक धमकी), 352 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान) और 353(2) (सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले बयान) के तहत एफआईआर दर्ज की थी।

विधायक को न्यायिक हिरासत में भेजते समय मजिस्ट्रेट ने कथित भाषण की गंभीरता का उल्लेख करते हुए अरनेश कुमार मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया।

--आईएएनएस

डीएससी