नई दिल्ली, 1 जुलाई (आईएएनएस)। भारत की विरासत सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों, हमारी मिट्टी और हमारे किलों की दीवारों में आज भी जिंदा है। यह वो धरती है, जहां हर हर किला और हर इमारत कोई कहानी कहती है। यह गाथा होती है वीरता, आत्मसम्मान और संस्कृति की। इसी अमिट गाथाओं में से एक है, मुंबई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनस।
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के लिए 2 जुलाई 2004 की तारीख सबसे अहम मायने रखती है, क्योंकि इस दिन छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन को यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति की ओर से विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था। पूरी इमारत का ढांचा आज भी वैसा ही है जैसा पहले था। इसका बाहरी हिस्सा, बाहर से दिखने वाला रूप और इस्तेमाल का तरीका ओरिजिनल है।
एक दौर था, जब मुंबई में छत्रपति शिवाजी टर्मिनस को विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन के रूप में जाना जाता था। यह इमारत भारत में विक्टोरियन गोथिक वास्तुकला के पुनरुद्धार का एक शानदार उदाहरण है, जिसमें भारतीय पारंपरिक वास्तुकला से प्रेरित तत्वों का मिश्रण है।
यह दो संस्कृतियों के संगम का भी बेहतरीन उदाहरण है, क्योंकि ब्रिटिश वास्तुकारों ने भारतीय शिल्पकारों के साथ मिलकर भारतीय वास्तुकला की परंपरा और शैलियों को शामिल किया, इस प्रकार मुंबई के लिए एक नई अनूठी शैली का निर्माण किया। इसका शानदार पत्थर का गुंबद, बुर्ज, नुकीले मेहराब और बारीक नक्काशी, इटैलियन गोथिक और भारतीय महल वास्तुकला, दोनों की झलक दिखाते हैं।
यह उपमहाद्वीप का पहला टर्मिनस स्टेशन था। मुंबई शहर के दक्षिणी हिस्से में स्थित इस स्टेशन का उद्घाटन 20 जून 1887 को ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक की 25वीं वर्षगांठ के मौके पर किया गया था। इसका निर्माण ब्रिटिश इंजीनियर फ्रेडरिक विलियम स्टीवंस की देखरेख में पूरा हुआ था। नए 'इनक्रेडिबल इंडिया' की रिपोर्ट कहती है कि स्टेशन को बनाने में 10 साल लगे और कुल 260,000 स्टर्लिंग पाउंड का खर्च आया।
भारत की पहली ट्रेन 1853 में ठाणे और बोरीबंदर के बीच चली थी। 1853 से 1887 तक इस स्टेशन को बोरीबंदर स्टेशन के नाम से जाना जाता था। 1887 से 1996 तक इसका नाम विक्टोरिया टर्मिनस था और फिर 1996 से 2017 तक इसका नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी टर्मिनस कर दिया गया। 2017 में, इसे इसका मौजूदा नाम 'छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस' मिला।