नई दिल्ली, 19 जून (आईएएनएस)। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 20 जून को अपना 68वां जन्मदिन मनाएंगी। आदिवासी समाज के साथ ही पूरे देश के लिए द्रौपदी मुर्मु प्रेरणास्रोत हैं। हालांकि, जीवन यात्रा के दौरान दो जवान बेटे उनकी आंखों के सामने दुनिया को छोड़कर चले गए। बाद में जीवनसाथी की भी मौत हो गई। समय बार-बार उनका इम्तिहान ले रहा था। यह गम ऐसा था, जो किसी को भी अंदर से तोड़ सकता था लेकिन उन्होंने आत्मविश्वास और हौसलों के साथ इन हालातों का सामना किया और खुद को मजबूत किया। अध्यात्म के सहारे खुद को इतना सबल बनाया कि मुश्किलें उनके सामने सिर झुकाने लगीं। देश की प्रथम नागरिक और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के जीवन की कहानी सच में प्रेरणादायक है।
ओडिशा के एक छोटे से आदिवासी गांव से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचना किसी के लिए भी आसान नहीं था। खासकर सीमित संसाधन, सामाजिक चुनौतियां और कठिन हालात में उन्होंने जिस तरह शिक्षा को अपना हथियार बनाया और आगे बढ़ती रहीं, वह उनकी मजबूत इच्छाशक्ति का उदाहरण है। अपने गांव से कॉलेज जाने वाली पहली छात्रा से लेकर राष्ट्रपति बनने तक उनका सफर भी लोकतंत्र की ताकत को दिखाता है।
द्रौपदी मुर्मु का जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के दूरस्थ मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गांव में एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उपरबेड़ा प्राथमिक विद्यालय में हुई। अपने दृढ़ संकल्प के माध्यम से और शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से वे 8वीं कक्षा से आगे की पढ़ाई के लिए भुवनेश्वर गईं। वह मैट्रिक की परीक्षा पास करने और कला स्नातक की उपाधि प्राप्त करने वाली अपने गांव की पहली बालिका बनीं। उन्होंने साल 1979 में भुवनेश्वर के रमादेवी महिला महाविद्यालय से राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1980 में उनकी शादी श्यामचरण मुर्मु से हुई, जो एक बैंक अधिकारी थे।
उनके प्रारंभिक जीवन को संघर्ष, धैर्य और उनके परिवार से मिले मजबूत नैतिक मूल्यों से आकार मिला। उन्होंने अनेक सामाजिक और वित्तीय कठिनाइयों का सफलतापूर्वक सामना किया और वे आदिवासी समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनीं। इन प्रारंभिक संघर्ष भरे वर्षों में उनकी सार्वजनिक सेवा और नेतृत्वशीलता से प्राप्त उपलब्धियों की नींव रखी गई।
एक समय ऐसा आया जब 2009 में द्रौपदी मुर्मु डिप्रेशन में चली गई थीं। 25 साल की उम्र में उनके बेटे की असमय मौत हो गई थी, जिससे उन्हें गहरा सदमा लगा था और वे डिप्रेशन में जा चुकी थीं। खुद को हिम्मत देने के लिए उन्होंने आध्यात्म का रास्ता चुना और वे ब्रह्माकुमारी संस्था के साथ जुड़ गईं। वह धीरे-धीरे डिप्रेशन से बाहर आ ही रही थीं लेकिन समय ने उनकी एक और परीक्षा ले ली। दुख का पहाड़ ऐसा टूटा था कि सिर्फ चार साल के बाद 2013 में एक अन्य दुर्घटना में द्रौपदी मुर्मु के दूसरे बेटे का भी निधन हो गया था।
दोनों बेटों का निधन उनके लिए किसी बड़ी त्रासदी से कम नहीं था लेकिन दुखों का यह दौर यहीं समाप्त नहीं हुआ। दूसरे बेटे की मृत्यु के कुछ दिनों बाद ही उनकी मां और उनके भाई का निधन हो गया था। वे इस गम को भुला पातीं, उसके पहले 2014 में पति श्यामचरण मुर्मु भी दुनिया को छोड़कर चले गए। इस तरह कुछ वर्षों में ही धीरे-धीरे परिवार के कई सदस्य उनको छोड़कर चले गए। हालांकि, उन्होंने आध्यात्म के साथ योग शुरू किया, ताकि खुद डिप्रेशन से बाहर आ सकें। उन्होंने इसके खिलाफ तब तक लड़ाई लड़ी जब तक उन्होंने उसे हरा नहीं दिया।
अपने कष्टसाध्य व्यक्तिगत जीवन के बावजूद द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्र निर्माण के प्रति गहरे समर्पण से कार्य किया है, जिससे उनकी समय के अनुसार ढल जाने की असाधारण क्षमता का पता चलता है। उनकी दृढ़ता और उद्देश्यपूर्ण यात्रा से ऐसे समावेशी और सशक्त भारत बनाने की प्रेरणा मिलती रहेगी जहां हर व्यक्ति की गरिमा का सम्मान हो और सबको आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध हों।
द्रौपदी मुर्मु जमीनी स्तर पर लोकतंत्र से गहराई से जुड़ी रही हैं। उन्होंने समावेश, प्रतिसंवेदना और हाशिए पर पड़े लोगों के उत्थान के प्रति दृढ़ संकल्प रखते हुए शासन के तीनों स्तरों पर अपनी सेवाएं दी हैं।
मुर्मू ने 1997 में रायरंगपुर नगर पंचायत में पार्षद के तौर पर अपना राजनीतिक करियर शुरू किया। 2000 में, वह ओडिशा में भाजपा-बीजेडी गठबंधन सरकार के दौरान मंत्री बनीं। उन्हें 2007 में ओडिशा विधानसभा की ओर से सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए पंडित 'नीलकंठ दास-सर्वश्रेष्ठ विधायक' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
वह ओडिशा के रायरंगपुर से भाजपा के टिकट पर दो बार (2000 और 2009) विधायक रहीं। 2009 के चुनावों में जब बीजेडी ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया और सीएम नवीन पटनायक ने बड़ी जीत हासिल की, तब भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी।
द्रौपदी मुर्मु ने ओडिशा सरकार के परिवहन, वाणिज्य, मत्स्य पालन और पशुपालन मंत्रालयों का कामकाज संभाला। वह ओडिशा में भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा की उपाध्यक्ष और बाद में अध्यक्ष रहीं। मुर्मू को 2010 में भाजपा की मयूरभंज (पश्चिम) इकाई का जिला अध्यक्ष चुना गया और 2013 में वह फिर से चुनी गईं। उसी साल उन्हें भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी (एसटी मोर्चा) का सदस्य भी बनाया गया। 2015 में उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया और वे इस पद पर पहुंचने वाली पहली आदिवासी नेता बनीं।
वे 2015 से 2021 तक झारखंड की 9वीं राज्यपाल रहीं। इसके बाद द्रौपदी मुर्मु ने 25 जुलाई 2022 को भारत के 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। मुर्मु भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और भाषाई विविधता के संरक्षण और संवर्धन में अग्रणी भूमिका निभाती रही हैं। मुख्य रूप से उन्होंने संथाली भाषा को भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में संवैधानिक मान्यता दिलाने में अहम भूमिका निभाई और वे 'ओल चिकी' लिपि का संहिताकरण करने के लिए की गई पहल से जुड़ी रहीं। वे अनेक आदिवासी सामाजिक-शैक्षिक और सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ी रही हैं। स्वाध्याय में उनकी विशेष रूचि है और अध्यात्म में उनकी गहरी आस्था है।
राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति भवन में भारत की कला और सांस्कृतिक विरासत का प्रचार करने के लिए अनेक पहल की हैं। उन्होंने राष्ट्रपति भवन को आम जनता, विशेषकर बच्चों और दिव्यांगजनों के लिए खोलने और राष्ट्रपति भवन का भ्रमण सुलभ करने के लिए भी अनेक कदम उठाए हैं।
--आईएएनएस
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