अर्थव्यवस्था के मजबूत आधार ने भारत की पश्चिम एशिया संकट से निपटने में मदद की : आरबीआई एमपीसी मिनट्स

अर्थव्यवस्था के मजबूत आधार ने भारत की पश्चिम एशिया संकट से निपटने में मदद की : आरबीआई एमपीसी मिनट्स

मुंबई, 19 जून (आईएएनएस)। आरबीआई की ओर से शुक्रवार को मौद्रिक नीति कमेटी की बैठक के मिनट्स जारी किए गए। इसमें बताया गया कि अर्थव्यवस्था के मजबूत आधार ने देश की पश्चिम एशिया संकट से निपटने में मदद की है।

मौद्रिक नीति कमेटी (एमपीसी) के सदस्य नागेश कुमार ने कहा, "पिछले ज्यादातर आर्थिक संकटों (जैसे ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस, टेपर टैंट्रम या कोविड-19) के मुकाबले, पश्चिम एशिया संकट के समय भारतीय अर्थव्यवस्था के व्यापक आधार कहीं अधिक मजबूत थे।"

उन्होंने कहा कि फरवरी के आखिर में टकराव शुरू होने से पहले, भारतीय अर्थव्यवस्था जबरदस्त ग्रोथ और बहुत कम महंगाई वाले 'गोल्डीलॉक्स मोमेंट' में थी। देश के पास लगभग 11 महीने के आयात को कवर करने वाला करीब 700 अरब डॉलर का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और बेहतर निर्यात स्थिति, साथ ही सर्विसेज के अच्छे निर्यात की वजह से चालू खाता घाटा भी ठीक-ठाक स्तर पर था। हालांकि 10 साल के औसत से 20 प्रतिशत अधिक पानी वाले बांधों के स्तर से मानसून में होने वाली संभावित कमी को कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, समय के साथ भारतीय खेती में मानसून के उतार-चढ़ाव से निपटने की क्षमता बढ़ी है और उस पर इसका असर कम हुआ है।

कुमार ने कहा,"पिछले कुछ वर्षों में राजकोषीय मजबूती पर केंद्रित किए गए ध्यान से राजकोषीय घाटे को 2022-23 में जीडीपी के 6.5 प्रतिशत से धीरे-धीरे घटाकर 2025-26 तक 4.4 प्रतिशत पर लाने में मदद मिली है। इससे पश्चिम एशिया संकट से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ राजकोषीय गुंजाइश मिलती है। इसमें आर्थिक विकास को सहारा देना शामिल है, जिसके लिए सार्वजनिक निवेश को बनाए रखा जाएगा और बढ़ाया भी जाएगा, ताकि बढ़ती लागत के कारण निजी खपत में आई किसी भी कमी को दूर किया जा सके और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण सब्सिडी के बढ़ते बोझ को संभाला जा सके।

केंद्रीय बैंक ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला में लंबे समय तक व्यवधान और दक्षिण-पश्चिम मानसून के भौगोलिक और सामयिक वितरण को लेकर अनिश्चितता के चलते मुद्रास्फीति का दृष्टिकोण अभी भी अनिश्चित बना हुआ है।

आरबीआई मिनट्स के अनुसार, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति मार्च में मामूली रूप से बढ़कर 3.4 प्रतिशत और अप्रैल में 3.5 प्रतिशत हो गई, जिसका मुख्य कारण खाद्य पदार्थों की बढ़ती मुद्रास्फीति है।

ईंधन की कीमतों में मुद्रास्फीति कम रही क्योंकि खुदरा कीमतों में वृद्धि का असर अभी तक बाजार में पूरी तरह से नहीं दिखा है।

आरबीई को उम्मीद है कि तिमाही दर तिमाही मुद्रास्फीति में तेजी आएगी। सीपीआई अनुमान पहली तिमाही में 4.2 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 5.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 5.9 प्रतिशत और अंतिम तिमाही में 5.4 प्रतिशत रहने की उम्मीद है।

मौद्रिक नीति कमेटी के सदस्य राम सिंह ने कहा, "आरबीआई के एनालिसिस से एनर्जी की कीमतों और घरेलू महंगाई के बीच साफ संबंध का पता चलता है। अगर कच्चे तेल की कीमतें बेसलाइन से 10 प्रतिशत ज्यादा होती हैं और इसका पूरा असर घरेलू प्रोडक्ट की कीमतों पर पड़ता है, तो महंगाई लगभग 50 आधार अंक बढ़ सकती है। कच्चे तेल के आयात का बढ़ा हुआ बिल हमारे चालू खाता घाटा को बढ़ाता है।"

हालांकि, अब अमेरिका और ईरान शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर चुके हैं और होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही सामान्य हो गई है, जिसके कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई है और ये लगभग 75 प्रति बैरल डॉलर हो गई हैं; उम्मीद है कि इससे आगे चलकर महंगाई कम होगी।

--आईएएनएस

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