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सोमालिया में फिर लौट रहे समुद्री लुटेरे, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

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नई दिल्ली, 8 सितंबर (आईएएनएस)। हिंद महासागर की लहरों पर एक पुराना खतरा फिर सवार हो रहा है। सोमालिया के तट के आसपास कभी खौफ का पर्याय रहे पाइरेट्स यानी समुद्री डाकू करीब एक दशक की अपेक्षाकृत शांति के बाद दोबारा एक्शन में आ गए हैं। अप्रैल 2026 के अंत से अब तक कई जहाजों के अपहरण की घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।

इस कहानी का एक अहम सिरा भारत से भी जुड़ा है। इस साल ऐसी भारतीय जल क्षेत्र के इर्द-गिर्द दो घटनाएं हुईं जो चिंता बढ़ाती हैं। 1 जुलाई 2026 को भारतीय नौसेना ने अदन की खाड़ी में एक व्यापारिक जहाज पर समुद्री डकैती के प्रयास के खिलाफ तत्काल कार्रवाई कर यह दिखाया था कि हिंद महासागर क्षेत्र में किसी भी खतरे को भारत हल्के में नहीं लेता। हमला जिबूती से लगभग 300 समुद्री मील पूर्व-उत्तर-पूर्व में हुआ था

1 जुलाई 2026 को 'एमवी गोल्डन आर्सिनल' पर समुद्री डकैती के प्रयास की सूचना मिलने के बाद अदन की खाड़ी में तैनात भारतीय नौसेना का युद्धपोत 'आईएनएस त्रिकंद' सक्रिय हुआ। जहाज पर 21 सदस्यीय चालक दल था, जिसमें एक भारतीय नागरिक भी शामिल था।

हमले की आशंका के बीच चालक दल ने जहाज के सुरक्षित हिस्से यानी ‘सिटाडेल’ में शरण ली। भारतीय नौसेना ने स्थिति पर नजर रखते हुए कार्रवाई शुरू की। इसके बाद 2 जुलाई को नौसेना की टीम जहाज पर पहुंची और उसकी तलाशी ली। चालक दल को सुरक्षित पाया गया और किसी समुद्री डाकू की मौजूदगी नहीं मिली।

इस अभियान में भारतीय नौसेना के पी-8I समुद्री निगरानी विमान ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खतरा टलने के बाद जहाज ने अपनी यात्रा फिर शुरू कर दी।

27 मई 2026 को भी ऐसी ही कोशिश हुई थी जिसे नाकाम कर दिया गया था। तब मालवाहक जहाज एमवी माशाल्लाह-1 निशाने पर था। नौसेना के ‘आईएनएस कोलकाता’ ने तत्काल कार्रवाई की और लुटेरे भाग निकले। इसके बाद नौसेना ने मालवाहक जहाज को भारतीय समुद्री सीमा से सुरक्षित बाहर निकाला। अधिकारियों ने बताया था कि भारतीय नौसेना वर्ष 2008 से अदन की खाड़ी में समुद्री डकैतों के खिलाफ अभियान के तहत तैनाती बनाए हुए है।

यह घटनाएं बताती हैं कि समुद्री डकैती भारत के लिए कोई दूर बैठकर देखने वाला संकट नहीं है। जिस समुद्री क्षेत्र में यह घटनाएं हो रही हैं, वही रास्ते भारत के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

सोमालिया के समुद्री डाकुओं की गतिविधियां एक समय इतनी बढ़ गई थीं कि अदन की खाड़ी से गुजरने वाले जहाजों के लिए यह दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री मार्गों में शामिल हो गया था। अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक गश्त, जहाजों की बेहतर सुरक्षा और सोमालिया में स्थानीय स्तर पर कार्रवाई के चलते हमलों में भारी कमी आई।

अब हालात बदल चुके हैं। लाल सागर और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों ने अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाया है। कई युद्धपोत और निगरानी संसाधन अब दूसरे संवेदनशील समुद्री इलाकों में व्यस्त हैं। इसी बीच जहाजों के मार्गों में बदलाव ने सोमाली तट और अरब सागर के आसपास समुद्री गतिविधियां बढ़ा दी हैं।

समुद्री डाकू इसी बदली हुई स्थिति का फायदा उठाते दिख रहे हैं।

'द गार्जियन' की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल के अंत से अब तक आठ जहाजों के अपहरण की घटनाएं सामने आई हैं। इससे आशंका बढ़ी है कि सोमाली समुद्री डकैती फिर से संगठित रूप ले सकती है।

आज के समुद्री डाकू 2010-11 के दौर के अपराधियों से अलग तरीके अपना रहे हैं। वे पहले कब्जे में लिए गए जहाजों को ‘मदरशिप’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं और समुद्र में ज्यादा दूर जाकर संभावित निशानों की तलाश कर रहे हैं।

तकनीक ने भी उनकी क्षमता बढ़ाई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 'स्टारलिंक' सैटेलाइट नेटवर्क जैसी आधुनिक संचार सुविधाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं।

यानी खतरा केवल छोटी नौकाओं में सवार समुद्री डाकुओं तक सीमित नहीं है। अब वे बेहतर संचार, बड़े जहाजों और बदले हुए समुद्री मार्गों का फायदा उठाकर ज्यादा दूर तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत की चिंता का सबसे बड़ा कारण यह है कि अरब सागर और अदन की खाड़ी भारत के समुद्री व्यापार के लिए महत्वपूर्ण संपर्क क्षेत्र हैं।

भारत का पश्चिमी तट वैश्विक समुद्री व्यापार नेटवर्क से जुड़ा है। ऊर्जा, कच्चा माल और तैयार उत्पाद लेकर आने-जाने वाले जहाजों के लिए पश्चिम एशिया और अफ्रीका के आसपास के समुद्री मार्ग महत्वपूर्ण हैं। यदि सोमाली समुद्री डकैती फिर बड़े स्तर पर लौटती है तो उसका असर केवल जहाजों की सुरक्षा पर नहीं पड़ेगा। समुद्री बीमा की लागत बढ़ सकती है, जहाजों को लंबे रास्ते अपनाने पड़ सकते हैं और माल ढुलाई महंगी हो सकती है।

पहले से लाल सागर संकट के कारण वैश्विक शिपिंग प्रभावित है। ऐसे में अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती का नया खतरा समस्या को और जटिल कर सकता है।

पिछले वर्षों में भारतीय नौसेना ने हिंद महासागर क्षेत्र में खुद को केवल भारतीय जहाजों की सुरक्षा करने वाली ताकत के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा प्रदाता के तौर पर स्थापित किया है।

2011 के आसपास सोमाली समुद्री डकैती अपने चरम पर थी। जहाजों का अपहरण, चालक दल को बंधक बनाना और फिरौती मांगना एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय कारोबार बन गया था। इसके बाद बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभियानों और जहाजों की सुरक्षा व्यवस्था ने इस खतरे को लगभग खत्म कर दिया।

आज की स्थिति अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची है। लेकिन 2026 में सामने आ रही घटनाएं एक चेतावनी जरूर हैं।

अगर क्षेत्रीय संघर्ष जारी रहे, समुद्री निगरानी कमजोर हुई और सोमालिया के भीतर आर्थिक-सामाजिक अस्थिरता बनी रही, तो समुद्री डाकुओं के नेटवर्क को दोबारा पैर जमाने का मौका मिल सकता है।

--आईएएनएस

केआर/