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सद्गुरु ने पांच देशों का हिमालयी बोर्ड बनाने का दिया सुझाव, नेपाल के लिए 1 करोड़ देने का किया वादा

सद्गुरु

काठमांडू, 31 अगस्त (आईएएनएस)। नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई भयानक बाढ़ को लेकर सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने रविवार को काठमांडू में 'नेपाल के साथ एकजुटता' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष में 1 करोड़ का योगदान देने का वादा किया। उन्होंने इस नाजुक इलाके को प्रभावित करने वाली आपदाओं से निपटने के लिए हिमालयी देशों के बीच बेहतर सहयोग की भी अपील की।

इस त्रासदी में हजारों लोग लापता हैं और कई लोगों के मारे जाने की आशंका है। लापता लोगों में 'ईशा सेक्रेड वॉक्स कैलाश यात्रा' के 77 लोग शामिल हैं, जो आपदा के समय चीन की तरफ गियिरोंग इमिग्रेशन सेंटर पर थे और नेपाल की तरफ तैनात तीन ईशा स्वयंसेवक भी शामिल हैं।

सद्गुरु ने भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान को मिलाकर पांच देशों का हिमालयन बोर्ड बनाने का प्रस्ताव रखा और इन देशों से अपील की कि वे सभी के साझा पर्वतीय तंत्र से निपटने के लिए राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर सोचें।

सद्गुरु ने जोर देकर कहा, "पहाड़ों को आपकी राजनीतिक संबद्धता का पता नहीं होता। पहाड़ों को यह नहीं पता कि आप क्या बकवास करते हैं या कौन सी भाषा बोलते हैं। भले ही आप इसे एक इकाई के रूप में संचालित न कर सकें लेकिन कम से कम एक इकाई के रूप में परामर्श तो होना ही चाहिए। हमारे कार्यों में कुछ तालमेल होना चाहिए क्योंकि हिमालय इस ग्रह की सबसे शानदार और भव्य विशेषता है। साथ ही, वे बहुत नाजुक भी हैं।"

उन्होंने कहा, "जिन देशों में हिमालय की पर्वतमालाएं फैली हैं, उन सभी को मिलाकर एक संस्था का गठन अभी होना चाहिए। भले ही राजनीतिक प्रशासन अलग-अलग हों लेकिन पर्वतमालाओं को एक ऐसी विशेषता के रूप में देखा जाना चाहिए जिसे इस ग्रह पर आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने की आवश्यकता है। अगर हम ऐसा नहीं करते हैं और बस यही सोचते रहते हैं कि 'ठीक है, यह नेपाल की समस्या है, उन्हें अपनी समस्या से निपटने दें', तो इसका कभी कोई समाधान नहीं निकलेगा।"

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आपदा का पैमाना उम्मीद से कहीं अधिक था और इसके बाद की स्थिति के लिए सामूहिक प्रतिक्रिया की आवश्यकता है, न कि ऐसी स्थिति की जिसमें नेपाल से अकेले ही इससे निपटने की उम्मीद की जाए। सद्गुरु ने कहा, "किसी को उम्मीद नहीं थी कि ऐसा कुछ होगा कि ग्लेशियर की बर्फ का एक बड़ा टुकड़ा (तीन चौथाई हिस्सा) पहाड़ की चोटी से चार हजार फीट नीचे गिर जाएगा। ऐसी घटना का कोई पहले से अंदाजा नहीं लगाता। हालांकि, अब जब ऐसा हो गया है, तो हमें इस पर ध्यान देना होगा, क्योंकि नेपाल जैसा छोटा देश अकेले इसे हल नहीं कर सकता।"

सद्गुरु के साथ मंच साझा करने वालीं अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने उनसे पूछा कि लोग ऐसी तबाही के अनुभव से क्या सीख सकते हैं। इस पर सद्गुरु ने कहा, "एक इंसान के तौर पर, हमें आपदाओं के होने का इंतजार नहीं करना चाहिए। इंसान होने के नाते सबसे जरूरी बात यह समझना है कि हमें जिंदगी के हर पल यह पता होना चाहिए कि हम नश्वर हैं (हमारी मौत निश्चित है)। अगर हम लगातार इस बात के प्रति जागरूक रहें, तो हम अपनी जिंदगी की योजना और उसे जीने का तरीका सबसे समझदारी भरा रखेंगे।"

उन्होंने लोगों से यह भी कहा कि वे इस आपदा को 'दैवीय कारण' या 'रहस्यमयी संभावना' न मानें। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसी बातें इंसानी दुख की असलियत को कम कर सकती हैं। उन्होंने जिंदगी के आध्यात्मिक पहलुओं और प्राकृतिक घटनाओं को चलाने वाले भौतिक नियमों के बीच फर्क समझने की जरूरत पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, "नहीं, हमें ऐसी चीजों में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। दिव्यता एक अलग पहलू है। भौतिक घटनाएं, भौतिक घटनाएं ही होती हैं जो भौतिक नियमों से चलती हैं। इसलिए, दर्शन, विचारधाराओं या रहस्यमयी व्याख्याओं के जरिए इंसानी दुख को कम न आंकें। हो सकता है कि यह सब भगवान की मर्जी हो। नहीं, यह एक भौतिक घटना है।"

सद्गुरु ने यह भी घोषणा की कि कोयंबटूर के ईशा योग केंद्र में 'काल भैरव कर्म' किया जाएगा। यह एक पवित्र मृत्यु-अनुष्ठान है जो (प्राकृतिक और अप्राकृतिक) दोनों तरह की मौतों में मरने वालों को शांति और सुखद बदलाव दिलाने के लिए किया जाता है।

'इन सॉलिडैरिटी विद नेपाल' कार्यक्रम ने काठमांडू में लोगों को आपदा से प्रभावित लोगों के समर्थन में एक साथ लाया। तुरंत राहत पहुंचाने के अलावा, सद्गुरु ने हिमालय के प्रति गहरी सामूहिक जिम्मेदारी की बात कही, एक ऐसी जिम्मेदारी जो यह मानती है कि पहाड़ देशों के बीच खींची गई सीमाओं से परे हैं और उनका भविष्य उन सभी लोगों से जुड़ा है जो उन पर निर्भर हैं।

--आईएएनएस

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