ब्रुसेल्स, 19 सितंबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान में बलोच छात्र नेता जियंद बलोच की कथित जबरन गुमशुदगी का हालिया मामला एक बार फिर देश में जबरन गुमशुदगी के लंबे समय से चले आ रहे संकट को उजागर करता है। यूरोपियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में छात्र नेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और लापता लोगों के बारे में सवाल उठाने वालों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में जबरन गुमशुदगी का संकट केवल लापता लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन, सुरक्षा संस्थानों की जवाबदेही और न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। इसमें कहा गया है कि प्रभावित परिवार अब भी अपने प्रियजनों के बारे में सच जानने का इंतजार कर रहे हैं।
रिपोर्ट में बताया गया कि 24 जुलाई 2026 की सुबह क्वेटा स्थित अपने घर से जियंद बलोच को कथित तौर पर पाकिस्तानी सुरक्षा बल उठा ले गए। परिवार को उनकी गिरफ्तारी या हिरासत के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। 11 दिन बाद, 3 अगस्त को वह घर लौट आए। हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक, यह पहली बार नहीं था, बल्कि जियंद के साथ कथित तौर पर तीसरी बार ऐसा हुआ।
रिपोर्ट के अनुसार, जियंद पहली बार नवंबर 2018 में अपने पिता और छोटे भाई के साथ कथित तौर पर लापता हुए थे और करीब नौ महीने बाद लौटे। इसके बाद जुलाई 2024 में बलोच राजी मुची (बलोच नेशनल गैदरिंग) अभियान के दौरान वह लगभग एक महीने तक कथित तौर पर गायब रहे। इस बार उनकी गुमशुदगी 11 दिन तक रही।
रिपोर्ट में एमनेस्टी इंटरनेशनल का हवाला देते हुए कहा गया कि जियंद बलोच को उनके शांतिपूर्ण आंदोलन और बलोच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय भूमिका के कारण निशाना बनाया गया।
यूरोपियन टाइम्स ने कहा कि किसी एक व्यक्ति का बार-बार सार्वजनिक गतिविधियों के दौरान कथित तौर पर गायब होना राज्य की शक्तियों के इस्तेमाल, न्यायिक प्रक्रिया और जवाबदेही से जुड़े बड़े सवाल खड़े करता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जियंद का मामला पाकिस्तान में जबरन गुमशुदगी के मुद्दे को फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ले आया है। इसमें संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों के फरवरी 2025 के एक संचार का उल्लेख किया गया, जिसमें बलूचिस्तान में कथित मनमानी गिरफ्तारियों, हिरासत में दुर्व्यवहार, जबरन गुमशुदगी और न्यायेतर हत्याओं पर चिंता जताई गई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंध, सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ आतंकवाद-रोधी कानूनों के उपयोग पर भी चिंता व्यक्त की थी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने पाकिस्तान के आतंकवाद-रोधी कानून और संबंधित प्रांतीय कानूनों में किए गए संशोधनों पर भी चिंता जताई थी। इन संशोधनों के तहत आतंकवाद से कथित संबंधों के आधार पर 90 दिनों तक निवारक हिरासत की अनुमति दी गई है। विशेषज्ञों का कहना था कि ऐसे प्रावधान राजनीतिक असहमति रखने वालों, मानवाधिकार रक्षकों, पत्रकारों, छात्रों और अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों के खिलाफ मनमानी हिरासत, जबरन गुमशुदगी और यातना के खतरे को बढ़ा सकते हैं।
--आईएएनएस
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