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अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस : पुरुषों से तीन महीने अधिक काम, फिर भी 'आधी आबादी' की 'आधी कमाई'

महिलाओं को समान वेतन नहीं मिलता, अर्थव्यवस्था और समाज पर प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय

नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। दुनियाभर में पुरुषों की तुलना में महिलाएं तकरीबन 20 प्रतिशत कम कमाती हैं। यह महज एक आंकड़ा नहीं है। ये लाखों महिलाएं हैं, जिनका काम परिवारों, व्यवसायों, समुदायों और अर्थव्यवस्थाओं को सहारा देता है, लेकिन फिर भी उन्हें उचित वेतन नहीं मिलता है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस पर पूरी दुनिया महिला कामगारों के साथ खड़ी होती है और समान मूल्य के काम के लिए समान वेतन की मांग दोहराती रही है।

हर साल 18 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस मनाया जाता है, जो समान मूल्य के काम के लिए समान वेतन प्राप्त करने की दिशा में किए जा रहे दीर्घकालिक प्रयासों का ही प्रतीक है। यह संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता और महिलाओं व लड़कियों के खिलाफ सभी तरह के भेदभाव से जुड़ी लड़ाई को मजबूत करता है।

वैश्विक स्तर पर लैंगिक वेतन अंतर एक व्यापक और लगातार बनी रहने वाली समस्या है। श्रम का असमान विभाजन घर से शुरू होता है और श्रम बाजार तक फैलता है, जहां महिलाओं को अक्सर पुरुषों के समान मौके हासिल करने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप रोजगार में भागीदारी दर, बेरोजगारी के स्तर और निर्णय लेने वाले पदों तक पहुंच में महत्वपूर्ण असमानताएं होती हैं।

उदाहरण के लिए आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं, चाहे उनकी शैक्षणिक योग्यता कितनी भी हो, अक्सर कम वेतन वाली नौकरियों या क्षेत्रों में अधिक संख्या में होती हैं, जबकि पुरुष अधिक वेतन वाले उद्योगों और नेतृत्व भूमिकाओं में रहते हैं। सभी देशों और सभी क्षेत्रों में, महिलाएं औसतन पुरुषों से कम कमाती हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया भर में महिला कर्मचारी पुरुषों की कमाई के हर डॉलर के मुकाबले लगभग 78 सेंट कमाती हैं।

यह लगातार बनी रहने वाली वेतन असमानता न सिर्फ मौलिक मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि एक बड़ी आर्थिक चिंता भी है, क्योंकि लैंगिक वेतन अंतर को कम करने से महिला कार्यबल की पूरी क्षमता का उपयोग करके आर्थिक विकास में योगदान दिया जा सकता है।

विश्व की आधी आबादी महिलाओं और लड़कियों की है और इसलिए उनकी क्षमता का भी आधा हिस्सा उन्हीं के पास है। लिहाजा, लैंगिक समानता एक मौलिक मानवाधिकार होने के साथ-साथ शांतिपूर्ण समाजों, पूर्ण मानवीय क्षमता और सतत विकास के लिए भी जरूरी हो जाती है।

महिलाओं के अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र का समर्थन संगठन के संस्थापक चार्टर से शुरू हुआ। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुच्छेद 1 में घोषित उद्देश्यों में से एक है, 'जाति, लिंग, भाषा या धर्म के आधार पर बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता के सम्मान को बढ़ावा देने और प्रोत्साहित करने में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना।'

संयुक्त राष्ट्र के पहले वर्ष के भीतर ही आर्थिक और सामाजिक परिषद ने महिलाओं की स्थिति पर अपना आयोग स्थापित किया, जो लैंगिक समानता और महिलाओं की उन्नति के लिए समर्पित प्रमुख वैश्विक नीति-निर्माण निकाय था। इसकी शुरुआती उपलब्धियों में से एक मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के मसौदे में लैंगिक रूप से तटस्थ भाषा सुनिश्चित करना था।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने 2024 में यह अनुमान लगाया कि प्रगति की वर्तमान दर से वैश्विक लैंगिक वेतन अंतर को पूरी तरह से समाप्त करने में 257 वर्ष लगेंगे। हालांकि, समान वेतन अंतरराष्ट्रीय गठबंधन (ईपीआईसी) इस लक्ष्य के साथ लगातार प्रयासों में जुटा हुआ है कि विश्व स्तर पर महिलाओं और पुरुषों के लिए समान वेतन सुनिश्चित किया जाए।

--आईएएनएस

डीसीएच/एबीएम