Chithirai Festival Greetings : तमिल नववर्ष पर बोले उपराष्ट्रपति, 'यह सिर्फ पर्व नहीं, पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का उत्सव'

तमिल नववर्ष पर उपराष्ट्रपति का संदेश, चिथिराई को बताया परंपरा और नई आशा का पर्व
तमिल नववर्ष पर बोले उपराष्ट्रपति, 'यह सिर्फ पर्व नहीं, पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का उत्सव'

नई दिल्ली: भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने तमिल समुदाय के लोगों को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि चिथिराई का पहला दिन न केवल तमिलों के लिए बल्कि पूरे विश्व के लोगों के लिए एक नई और शुभ शुरुआत बने।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि तमिल नववर्ष केवल एक पारंपरिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का उत्सव है। यह परंपरा, परिवार, आध्यात्मिकता और जीवन की व्यवस्था को जोड़ने वाला पर्व है। यह नई आशाओं के साथ, पुराने अनुभवों से सीख लेकर आगे बढ़ने की शुरुआत है। तमिल संस्कृति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को दर्शाने वाले इस पर्व को हमें गर्व के साथ मनाना चाहिए।

सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि चिथिराई महीना कृषि की तैयारियों की शुरुआत का समय है। किसान भूमि को तैयार करने का कार्य शुरू करते हैं। हमारे लोग, जो मानते हैं कि मेहनत ही उन्नति का मार्ग है, इस श्रम की शुरुआत को उत्सव के रूप में मनाते हैं। पूरे देश में इस प्रकार के उत्सव देखने को मिलते हैं, जो भारत की एकता और समरसता का उदाहरण हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तर भारत के पंजाब में लोग बैसाखी को फसल उत्सव के रूप में मनाते हैं। दक्षिण में केरल में विषु मनाया जाता है, जहां 'कनी' देखने की परंपरा महत्वपूर्ण है। असम में बिहू और पश्चिम बंगाल में पोहेला बोइशाख बड़े उत्साह से मनाया जाता है। इसी तरह मणिपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में भी इस दिन को नववर्ष के रूप में मनाया जाता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि उत्तराखंड के हरिद्वार में इस दिन देशभर से लोग गंगा में स्नान करने के लिए एकत्रित होते हैं। तेलुगु भाषी लोग हाल ही में उगादि के रूप में अपना नववर्ष मना चुके हैं, जबकि मराठी और कोंकणी लोग गुड़ी पड़वा मनाते हैं। हम उस प्राचीन सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं, जो बहुत प्राचीन काल से अस्तित्व में है। हमारे पूर्वजों का वैज्ञानिक ज्ञान यह दर्शाता है कि उन्हें विश्व और उसके संचालन का गहरा ज्ञान था।

उन्होंने कहा कि पृथ्वी को सूर्य का एक चक्कर लगाने में लगभग 365.25 दिन लगते हैं। इसी गणना के आधार पर हमारा नववर्ष निर्धारित होता है। इसलिए तमिल पंचांग का समय निर्धारण सटीक और संतुलित है। हालांकि हमें वैश्विक कैलेंडर का पालन करना आवश्यक है, लेकिन हमें अपने तमिल कैलेंडर को भी याद रखना चाहिए। केवल दिन और महीनों ही नहीं, बल्कि वर्षों के भी नाम रखने की परंपरा हमारी विशेषता है। कुल 60 वर्षों के नाम होते हैं, जिनमें वर्तमान 'पराभव' वर्ष चालीसवां है।

उन्होंने यह भी कहा कि 'एस्ट्रोनॉमी' शब्द ग्रीक भाषा से आया है, जिसका अर्थ है 'नक्षत्रों के नियमों का अध्ययन करने वाला विज्ञान'। हमारे पूर्वज इसे 'खगोल विज्ञान' कहते थे। हजारों साल पहले ही उन्होंने यह समझ लिया था कि पृथ्वी गोल है और ग्रहों की गति का अध्ययन किया था।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि संगम साहित्य में ग्रहों और नक्षत्रों के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। उदाहरण के लिए, कवि कपिलर ने पुरनानूरु में शनि ग्रह को 'काले रंग का' बताया है। हमारे पूर्वजों को ग्रहों के मानव जीवन पर प्रभाव का गहरा ज्ञान था। ऐसे गणना करने वालों को 'कनियन' कहा जाता था। कवि कनियन पूंगुंद्रनार का नाम इसी परंपरा से जुड़ा है। तोलकाप्पियार ने ऐसे ज्ञानी लोगों को 'अरिवर' कहा है। प्राचीन काल से ही विवाह जैसे शुभ कार्य शुभ समय देखकर किए जाते थे, जैसा कि अगनानूरु में वर्णित है। यह परंपरा आज भी जारी है।

उन्होंने कहा कि पंचांग के पांच अंग होते हैं, 'वार, तिथि, करण, नक्षत्र और योग'। इनके आधार पर वर्षा, खेती और समृद्धि के बारे में भविष्यवाणी की जाती है। हमारे पूर्वज सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति के आधार पर समय की गणना करते थे। आज आधुनिक उपकरणों से ग्रहण की गणना की जाती है, लेकिन हमारे पूर्वजों ने इसे सदियों पहले ही सटीक रूप से निर्धारित कर लिया था। क्या हमारे पूर्वजों का ज्ञान हमारी धरोहर नहीं है? इसलिए हमें इसे संरक्षित करना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि दक्षिण-पूर्व एशिया में तमिलों की बड़ी संख्या और ऐतिहासिक संबंधों के कारण श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर और मॉरीशस में भी तमिल नववर्ष धूमधाम से मनाया जाता है। यह उत्सव हमारी सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है और यह भी दिखाता है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से नववर्ष मनाया जाता है, जो हमारी एकता का प्रतीक है।

--आईएएनएस

 

 

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