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इतिहास की गलतियों के लिए क्षमा का संदेश है उज्बेकिस्तान का सम्मान: सरिता अग्रवाल

इतिहास

हैदराबाद, 31 अगस्त (आईएएएस)। भाजपा नेता सरिता अग्रवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उज्बेकिस्तान द्वारा दिए गए सर्वोच्च नागरिक सम्मान पर एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी की टिप्पणी पर सवाल उठाए हैं। इसके साथ ही उन्होंने कर्नाटक के कांग्रेस मंत्री बसवराज रायरेड्डी के इस कथित बयान की भी आलोचना की, जिसमें उन्होंने इस्लाम को अन्य धर्मों से बेहतर बताया था।

उज्बेकिस्तान में प्रधानमंत्री मोदी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिए जाने को लेकर ओवैसी की टिप्पणी पर सरिता अग्रवाल ने सवाल किया कि इस बयान के पीछे उनकी मंशा क्या है। उज्बेकिस्तान को बाबर के मूल देश से जोड़कर प्रधानमंत्री मोदी के सम्मान पर टिप्पणी करने का आखिर क्या औचित्य है। क्या सिर्फ इसलिए कि बाबर का संबंध उस क्षेत्र से था, अब बाबर के सामने झुकने की बात की जानी चाहिए? उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐतिहासिक घटनाओं को इस सम्मान से जोड़कर बाबर को सही ठहराने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि बाबर को इतिहास में एक अत्याचारी शासक के तौर पर देखा जाता है और उसके शासनकाल में बड़े पैमाने पर हिंसा और नरसंहार हुए। आज के समय में किसी देश द्वारा भारत के प्रधानमंत्री को सम्मानित किए जाने को सदियों पुराने शासकों के कृत्यों से जोड़ना तर्कसंगत नहीं है।

सरिता अग्रवाल ने कहा कि उज्बेकिस्तान द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जाना दोनों देशों के बीच मौजूदा संबंधों और मित्रता का प्रतीक है। इस सम्मान के जरिए उज्बेकिस्तान ने इतिहास की गलतियों के लिए एक तरह से क्षमा याचना का संदेश दिया है। पीएम मोदी ने यह सम्मान स्वीकार कर यह स्पष्ट किया है कि आज की दुनिया में बाबर जैसे निरंकुश शासक आदर्श नहीं हैं। ऐसे शासक इतिहास के पन्नों में पीछे छूट चुके हैं और अब भारत तथा उज्बेकिस्तान भविष्य के संबंधों को मजबूत करने के लिए साथ आगे बढ़ रहे हैं। मृत अतीत को बार-बार सामने लाकर प्रधानमंत्री मोदी के सम्मान को बाबर से जोड़ने का कोई औचित्य नहीं है। ओवैसी ने किस तथ्य या तर्क के आधार पर ऐसी टिप्पणी की, यह उनकी समझ से परे है।

कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायरेड्डी के उस कथित बयान पर भी सरिता अग्रवाल ने आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने इस्लाम को अन्य धर्मों से बेहतर बताया था। उन्होंने कहा कि प्रत्येक धर्म और संप्रदाय की अपनी मान्यताएं, मूल्य और जीवन पद्धति होती है। किसी व्यक्ति को अपने धर्म या किसी दूसरे धर्म को मानने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है।

उन्होंने कहा कि मंत्री पद पर बैठे व्यक्ति से सभी धर्मों और समुदायों के प्रति समान दृष्टिकोण की अपेक्षा की जाती है। किसी एक धर्म को दूसरे धर्मों से बेहतर बताने वाला बयान मंत्री की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से कुरान पढ़ना चाहता है या हज पर जाना चाहता है तो यह उसकी निजी स्वतंत्रता है। लेकिन संवैधानिक पद पर रहते हुए किसी धर्म को अन्य धर्मों से श्रेष्ठ बताना उचित नहीं है। इस तरह की टिप्पणी संकीर्ण सोच, तुष्टीकरण की राजनीति या किसी विशेष समुदाय को खुश करने की मानसिकता को दर्शा सकती है। मंत्री को अपने पद की जिम्मेदारी समझनी चाहिए और धर्म या समुदाय के आधार पर किसी के प्रति पक्षपात नहीं करना चाहिए। सार्वजनिक पद पर बैठे नेताओं को सभी नागरिकों और सभी धर्मों को समान नजर से देखने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

--आईएएनएस

पीएसके