नई दिल्ली, 3 सितंबर (आईएएनएस)। 2 मई 1867 को ईस्ट इंडिया एसोसिएशन में जब दादाभाई नौरोजी मुख्य रूप से ब्रिटिश श्रोताओं के सामने 'इंग्लैंड के भारत के प्रति कर्तव्य' पेपर पढ़ रहे थे तो वे न सिर्फ राजनीति में आंकड़ों का परिचय करा रहे थे, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के लुटेरा बनकर भारत की संपत्ति को ब्रिटेन ले जाने का खुलासा भी कर रहे थे।
4 सितंबर 1825 को महाराष्ट्र के बंबई (मुंबई) में एक गरीब पारसी परिवार में जन्मे दादाभाई नौरोजी की विदेशों में भारत के पक्ष की लगातार वकालत करना और जन-बहस को आकार देने में आंकड़ों के इस्तेमाल में महारत हासिल थी।
"सिर्फ 'घरेलू खर्चों' के रूप में ही 1829 के बाद से, पिछले छत्तीस वर्षों में ही, सार्वजनिक कर्ज पर ब्याज को छोड़कर, लगभग 100 मिलियन पाउंड स्टर्लिंग भारत की संपत्ति से इंग्लैंड की संपत्ति में स्थानांतरित हुए हैं। 1829 के बाद से भारत में कुल क्षेत्रीय खर्च लगभग 820 मिलियन रहा है। मान लीजिए कि इस बाद वाली राशि में से सिर्फ एक-आठवां हिस्सा वह राशि है जो सरकारी सेवा में लगे यूरोपीय लोगों की ओर से रिश्तेदारों और परिवारों के भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा, सेवानिवृत्ति के समय की गई बचत, अपने उपभोग के लिए अंग्रेजी वस्तुओं की खरीद के लिए खर्च की गई राशि, और साथ ही भारत में अंग्रेजी उत्पाद और निर्मित सरकारी स्टोर्स के लिए भुगतान की गई राशि के रूप में इंग्लैंड भेजी जाती है, तो यह इंग्लैंड की संपत्ति में जुड़ने वाले 100 मिलियन और हो गए।"
दादाभाई नौरोजी ने जो आंकड़े दिए थे, वे भारतीय लेखा-जोखा की संसदीय रिपोर्टों पर आधारित थे। उन्होंने द्वितीय सीमा शुल्क रिपोर्ट-1858 का भी सहारा लिया था। उनके भाषण ऐसे ही गणितीय आंकड़ों से भरे होते थे। लेकिन वह जानते थे कि श्रोता आंकड़ों से धैर्य खो सकते हैं। लेकिन एक पाठक उन्हें जितनी बार चाहे, दोबारा पढ़ सकता है। इसलिए उनके निबंध भारी आंकड़ों से लदे होते थे। उनके भाषण स्पष्ट होते थे।
दादाभाई ने मूल्य वृद्धि, मजदूरी, कराधान, टैरिफ, किराया, उधार दरों, कृषि उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों, आयात-निर्यात के आंकड़ों और मुद्रा विनिमय दरों को राजनीतिक चर्चा का विषय बनाया। उन्होंने यह स्थापित करने की कोशिश की कि ब्रिटिश शासन ने भारत को आर्थिक रूप से बर्बाद कर दिया है। इसने गरीबी को तेजी से बढ़ाया है। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी दुर्भावनापूर्ण नीति स्वयं ब्रिटिश सिद्धांतों के ही खिलाफ है। इसलिए, उन्होंने अपनी महान कृति का नाम 'भारत में गरीबी और गैर-ब्रिटिश शासन' (1901) रखा।
दादाभाई वास्तव में भविष्य के नेताओं के लिए रास्ता बना रहे थे। तथ्यों के साथ-साथ आंकड़ों पर पकड़ रखने वाले एक विधायक की राय अधिक विश्वसनीय होती है। दादाभाई की दूसरी महत्वपूर्ण विरासत विदेश में भारत के हितों की वकालत करना था। उन्होंने इसे ईस्ट इंडियन एसोसिएशन के माध्यम से किया। फिर उन्होंने ब्रिटिश संसद में भारतीय हितों का समर्थन किया। पीआईबी के एक लेख में इसका विशेष उल्लेख है।
दादाभाई नौरोजी 1892 में ब्रिटेन की संसद में चुने जाने वाले पहले अश्वेत और पहले भारतीय थे। वे ब्रिटेन के 'हाउस ऑफ कॉमन्स' में पहुंचने वाले एशिया के पहले नेता थे। नौरोजी की ब्रिटिश संसद में पहुंचने की महत्वाकांक्षा के पीछे भारत की गरीबी थी। वे 1892 से 1895 तक ब्रिटेन के 'हाउस ऑफ कॉमन्स' के सदस्य रहे।
वे जातिवाद और साम्राज्यवाद के विरोधी थे। उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोले, जिसके कारण रुढ़िवादी पुरुषों के विरोध का भी सामना करना पड़ा था। बाद में धीरे-धीरे भारत में महिला शिक्षा को लेकर नौरोजी ने लोगों की राय को बदलने में मदद की।
उन्होंने दो बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष (1886 और 1893) के रूप में कार्य करने के अलावा 1905 में एम्स्टर्डम में सोशल डेमोक्रेट्स के अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वह 1908 में 83 वर्ष की आयु में स्थायी रूप से ब्रिटेन से भारत लौट आए।
1893 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में उन्होंने कहा था, "हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हम सब अपनी मातृभूमि की संतान हैं। सच तो यह है कि मैंने हमेशा इसी भावना के साथ काम किया है कि मैं एक भारतीय हूं और मेरा अपने देश और देशवासियों के प्रति कर्तव्य है। चाहे मैं हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई या किसी भी अन्य धर्म का मानने वाला होऊं, सबसे पहले मैं एक भारतीय हूं। हमारा देश भारत है। हमारी राष्ट्रीयता भारतीय है।"
--आईएएनएस
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