चेन्नई, 29 जुलाई (आईएएनएस)। तमिलनाडु के उच्च शिक्षा क्षेत्र में प्रशासनिक और शैक्षणिक चुनौतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। राज्य के 15 विश्वविद्यालयों में अभी तक स्थायी कुलपतियों की नियुक्ति नहीं हो पाई है, जिसके कारण इन संस्थानों में शासन व्यवस्था, शोध कार्यों और महत्वपूर्ण निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर चिंता बढ़ गई है।
कुलपति पद खाली रहने से प्रभावित होने वाले प्रमुख विश्वविद्यालयों में मद्रास विश्वविद्यालय, अन्नामलाई विश्वविद्यालय, मदुरै कामराज विश्वविद्यालय, भारथियार विश्वविद्यालय, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, तमिल विश्वविद्यालय, भारथिदासन विश्वविद्यालय, पेरियार विश्वविद्यालय, तिरुवल्लुवर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, डॉ. अंबेडकर विधि विश्वविद्यालय, तमिलनाडु ओपन विश्वविद्यालय और तमिलनाडु शारीरिक शिक्षा एवं खेल विश्वविद्यालय शामिल हैं।
स्थिति अगले महीने और गंभीर हो सकती है, जब कराईकुडी स्थित अलगप्पा विश्वविद्यालय और तिरुनेलवेली स्थित मनोनमनियम सुंदरनार विश्वविद्यालय के कुलपतियों का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। इसके बाद बिना स्थायी कुलपति वाले विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़कर 17 हो जाएगी।
शैक्षणिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि समस्या केवल कुलपतियों की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। कई विश्वविद्यालयों में रजिस्ट्रार, परीक्षा नियंत्रक, प्राचार्य, निदेशक और अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक पद भी लंबे समय से खाली पड़े हैं। मदुरै कामराज विश्वविद्यालय सहित कई संस्थान एक साल से अधिक समय से इन महत्वपूर्ण पदों पर स्थायी अधिकारियों के बिना काम कर रहे हैं।
लंबे समय से जारी इन रिक्तियों के कारण विश्वविद्यालयों की नियमित प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हुई है और कई महत्वपूर्ण शैक्षणिक एवं शोध गतिविधियों की गति धीमी हो गई है।
स्थायी कुलपतियों की अनुपस्थिति में राज्य सरकार ने विश्वविद्यालयों के प्रशासन की जिम्मेदारी आईएएस अधिकारियों को बतौर संयोजक सौंप दी है। हालांकि, कई अधिकारी चेन्नई से ही दूरस्थ रूप से विश्वविद्यालयों का काम संभाल रहे हैं और साथ ही कई अन्य सरकारी जिम्मेदारियां भी निभा रहे हैं। इससे विश्वविद्यालयों की प्रभावी निगरानी और समय पर निर्णय लेने की क्षमता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
वरिष्ठ प्रोफेसरों को भी अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारियां दी गई हैं, जिससे शिक्षकों में असंतोष पैदा हुआ है। फैकल्टी सदस्यों का कहना है कि इस व्यवस्था के कारण वरिष्ठता को लेकर विवाद बढ़े हैं और विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक माहौल प्रभावित हुआ है।
शोधकर्ताओं ने भी आरोप लगाया है कि स्थायी नेतृत्व के अभाव में कई शोध परियोजनाएं और लंबे समय से चल रहे अकादमिक कार्यक्रम धीमे पड़ गए हैं।
शिक्षाविदों का मानना है कि इस संकट का स्थायी समाधान केवल नए कुलपतियों की नियुक्ति से ही संभव है।
पिछली डीएमके सरकार के कार्यकाल में राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति के अधिकार को लेकर लंबे समय तक विवाद चलता रहा, जिसके कारण नियुक्तियां रुकी रहीं।
हालांकि मौजूदा मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर के बीच संबंधों को पहले की तुलना में अधिक सहयोगात्मक माना जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद कुलपतियों की नियुक्ति प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हो पाई है।
प्रोफेसरों का कहना है कि तमिलनाडु सरकार की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आई है, जिसके कारण विश्वविद्यालयों में अनिश्चितता बनी हुई है।
इस बीच, सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां 29 जुलाई, 2026 को कुलपति की शक्तियों से जुड़े एक अहम मामले पर सुनवाई होनी है। शीर्ष अदालत का यह फैसला राज्य के उच्च शिक्षा शासन और विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक ढांचे की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
--आईएएनएस
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