नई दिल्ली, 30 अगस्त (आईएएनएस)। शिवाजी गोविंदराव सावंत का जन्म 31 अगस्त 1940 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के एक छोटे से गांव आजरा में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें अपनी माता से कथा-कीर्तन और पौराणिक कहानियां सुनने को मिलती थीं।
आर्थिक तंगी के कारण उनका प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। युवावस्था में एक उत्कृष्ट कबड्डी खिलाड़ी रहे शिवाजी सावंत ने अपने पेशेवर करियर की शुरुआत अदालत में एक साधारण क्लर्क के रूप में की। अपनी कला को निखारने और पुस्तकालयों के निकट रहने के लिए, उन्होंने कोल्हापुर की राजाराम प्रशाला में 1962 से 1974 तक एक शिक्षक के रूप में कार्य किया। बाद में वे पुणे चले गए, जहां उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के शिक्षा विभाग की पत्रिका 'लोकशिक्षण' के सह-संपादक और फिर संपादक के रूप में कार्य किया।
शिवाजी सावंत की लेखनी का सबसे उज्ज्वल नक्षत्र उनकी कादंबरी (उपन्यास) 'मृत्युंजय' है, जो 1967 में प्रकाशित हुई थी। महाभारत के उपेक्षित किन्तु महान योद्धा कर्ण के जीवन पर आधारित इस उपन्यास को लिखने में उन्हें पूरे सात वर्ष का तप करना पड़ा। अपनी एफवाईबीए परीक्षा की तैयारी के दौरान प्रसिद्ध कवि केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' द्वारा रचित हिंदी खंडकाव्य 'कर्ण' पढ़ने के बाद उनकी यह प्रेरणा और भी प्रगाढ़ हो गई। कोल्हापुर की एक पुलिस चॉल में अपने बड़े भाई विश्वासराव के साथ रहते हुए उन्होंने इस उपन्यास का लेखन पूरी तरह गुप्त रखा था।
इसे प्रामाणिक बनाने के लिए उनका समर्पण इतना गहरा था कि उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान का प्रत्यक्ष अनुभव करने का निश्चय किया। उस समय उनकी जेब में केवल 50 रुपए (जिन्हें वे 'गिन्न्या' कहते थे) थे, लेकिन अपनी धुन के पक्के शिवाजी सावंत ने उसी सीमित धनराशि के साथ कुरुक्षेत्र की यात्रा की और वहां की भौगोलिक स्थिति का गहराई से अध्ययन किया। 'मृत्युंजय' में उन्होंने एक अनोखी आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग किया। यह उपन्यास छह अलग-अलग पात्रों (कर्ण, कुंती, दुर्योधन, वृषाली, शोण और श्रीकृष्ण) के दृष्टिकोण से लिखे गए स्वगत कथनों का एक अद्भुत संकलन है। यह शैली कर्ण के चरित्र को एक मानवीय ऊंचाई प्रदान करती है, जो भाग्य और स्वतंत्र इच्छा के द्वंद्व को दर्शाती है। इसी कृति ने उन्हें साहित्य जगत में 'मृत्युंजयकार' की उपाधि से विभूषित किया।
शिवाजी सावंत केवल एक पौराणिक कथाकार नहीं थे। उन्होंने इतिहास और मनोविज्ञान को भी अपनी लेखनी से जीवंत किया। 1980 में प्रकाशित उनका उपन्यास 'छावा' छत्रपती संभाजी महाराज के जीवन पर आधारित एक अत्यंत शक्तिशाली रचना है, जिसने पाठकों को मराठा साम्राज्य के इस वीर योद्धा के वास्तविक और मानवीय स्वरूप से परिचित कराया। इसका प्रभाव इतना व्यापक है कि 2025 में इसी पर आधारित एक हिंदी फिल्म का निर्माण हुआ, जिसने अपार व्यावसायिक सफलता प्राप्त की। वहीं, वर्ष 2000 में प्रकाशित 'युगंधर' में उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को केवल एक ईश्वर के रूप में नहीं, बल्कि एक सिद्ध रणनीतिकार और मानवीय संवेदनाओं से भरे महानायक के रूप में प्रस्तुत किया।
मराठी साहित्य में उनके इस अप्रतिम योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। 1994 में उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रतिष्ठित 'मूर्तिदेवी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया, और यह सम्मान पाने वाले वे पहले मराठी लेखक बने। उनकी रचनाओं का अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। उनके परिवार में पत्नी मृणालिनी, पुत्र अमिताभ और पुत्री कादंबिनी (जिन्होंने 'युगंधर' का अंग्रेजी अनुवाद किया) ने उनकी साहित्यिक यात्रा में बड़ा संबल प्रदान किया।
18 सितंबर 2002 को गोवा में 76वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद के लिए प्रचार करते समय हृदय गति रुकने से शिवाजी सावंत का आकस्मिक निधन हो गया था।
--आईएएनएस
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