नई दिल्ली, 11 सितंबर (आईएएनएस)। नई उड़ान ट्रस्ट, विश्व मांगल्य स्वनाथ परिषद, गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय तथा दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त सहयोग से 'स्वनाथ सम्मेलन-2026: अनाथ से स्वनाथ की ओर' का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन विश्वविद्यालय के ईस्ट दिल्ली कैंपस, सूरजमल विहार स्थित कन्वेंशन हॉल में आयोजित हुआ।
सम्मेलन में 2200 आफ्टर-केयर युवाओं ने सहभागिता की, जबकि दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग तथा गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से जुड़े लगभग 600 से अधिक पदाधिकारियों एवं प्रतिनिधियों सहित कुल 2800 से अधिक लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
'संरक्षण से आगे शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भरता की दिशा' पर बोलते हुए वक्ताओं ने कहा कि किसी बच्चे का माता-पिता के संरक्षण से वंचित होना उसके जीवन की अंतिम पहचान नहीं हो सकती। बच्चों को केवल भोजन, आवास और सुरक्षा उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें शिक्षा, संस्कार, भावनात्मक सहयोग, कौशल, रोजगार, मार्गदर्शन और आत्मनिर्भरता के अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है।
केंद्रीय राज्य मंत्री एवं भाजपा दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा ने कहा कि समाज की जिम्मेदारी केवल बच्चों को संरक्षण देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। प्रत्येक बच्चे को आगे बढ़ने के लिए शिक्षा, अवसर और सही मार्गदर्शन मिलना जरूरी है। उन्होंने कहा कि बच्चों की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें उचित मंच उपलब्ध कराया जाए, ताकि परिस्थितियां उनके सपनों के रास्ते में बाधा न बनें। उन्होंने ‘स्वनाथ’ की अवधारणा को बच्चों को सम्मान और अवसर से जोड़ने वाली सकारात्मक पहल बताया।
दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट ने कहा कि 18 वर्ष की आयु किसी बच्चे के संरक्षण का अंत नहीं, बल्कि उसके नए जीवन की शुरुआत होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आफ्टर-केयर युवाओं को बैंकिंग, वित्तीय साक्षरता, रोजगार, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य, दस्तावेज प्रबंधन, जीवन कौशल और मेंटरशिप की जानकारी देना जरूरी है। बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक एवं भावनात्मक वेलनेस को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई भी बच्चा 18 वर्ष की आयु के बाद स्वयं को अकेला महसूस न करे, इसके लिए सरकार, विश्वविद्यालय, सामाजिक संस्थाओं और समाज को मिलकर दीर्घकालिक व्यवस्था तैयार करनी होगी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक प्रशांत हरतालकर ने कहा कि बच्चों का भविष्य केवल सरकारी योजनाओं से सुरक्षित नहीं हो सकता। समाज के सक्षम वर्ग को भी आगे आकर बच्चों की शिक्षा, संस्कार, मार्गदर्शन और आत्मनिर्भरता में योगदान देना होगा। उन्होंने बच्चों के प्रति संवेदनशील सामाजिक दृष्टिकोण विकसित करने और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के कुलपति पद्मश्री प्रो. डॉ. महेश वर्मा ने कहा कि शिक्षा बच्चों के भविष्य को मजबूत बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उच्च शिक्षा संस्थानों को ऐसे युवाओं के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण, करियर मार्गदर्शन और रोजगार के अवसरों से जोड़ने की दिशा में आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की सामाजिक जिम्मेदारी केवल अकादमिक शिक्षा तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि जरूरतमंद बच्चों की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग की सचिव रश्मि सिंह ने अपने संबोधन में बाल अधिकारों, बाल संरक्षण तथा जरूरतमंद बच्चों तक सरकारी योजनाओं और सेवाओं की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, पोषण, भावनात्मक सहयोग और अपने व्यक्तित्व के विकास के समान अवसर मिलना उसका अधिकार है।
सचिव रश्मि सिंह ने कहा कि बाल संरक्षण व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य केवल बच्चों को तत्काल सुरक्षा प्रदान करना नहीं, बल्कि उन्हें शिक्षा, कौशल, मार्गदर्शन और आवश्यक सहयोग देकर आत्मनिर्भर एवं जिम्मेदार नागरिक बनाना होना चाहिए। इसके लिए सरकारी विभागों के साथ-साथ बाल देखभाल संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और समुदाय की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
रश्मि सिंह ने विशेष रूप से आफ्टर-केयर व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि बाल देखभाल संस्थानों से बाहर आने के बाद बच्चों के सामने शिक्षा, रोजगार, आवास, कौशल विकास और सामाजिक पुनर्वास जैसी अनेक चुनौतियां होती हैं। ऐसे समय में उन्हें अकेला छोड़ने के बजाय एक मजबूत सहयोगात्मक तंत्र उपलब्ध कराया जाना चाहिए, ताकि वे आत्मविश्वास के साथ अपने भविष्य का निर्माण कर सकें।
रश्मि सिंह ने कहा कि प्रत्येक बच्चे की परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए योजनाओं और सेवाओं को केवल सामान्य व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि बच्चे की व्यक्तिगत आवश्यकता और परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए लागू किया जाना चाहिए। विभागीय अधिकारियों, फील्ड कार्यकर्ताओं और सामाजिक संस्थाओं के बीच बेहतर संवाद और समन्वय से ऐसे बच्चों की पहचान और उन्हें उचित सेवाओं से जोड़ने का कार्य और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
सचिव रश्मि सिंह ने समाज से भी अपील की कि अनाथ एवं वंचित बच्चों को केवल सहानुभूति का पात्र न मानकर उन्हें सम्मान, अवसर और आत्मनिर्भरता का अधिकार दिया जाए। उन्होंने कहा कि जब कोई बच्चा शिक्षा और कौशल के माध्यम से अपने पैरों पर खड़ा होता है, तभी बाल संरक्षण की वास्तविक सफलता सुनिश्चित होती है।
उन्होंने बाल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्थाओं और सामाजिक संगठनों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि सरकार, समाज और स्वयंसेवी संस्थाओं के सामूहिक प्रयासों से ही ऐसा मजबूत तंत्र विकसित किया जा सकता है जिसमें कोई भी बच्चा संरक्षण, शिक्षा, अवसर और सम्मान से वंचित न रहे।
--आईएएनएस
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