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‘समान नागरिक संहिता कबूल नहीं है', मुस्लिम धर्मगुरुओं ने जताई आपत्ति

भारत के मुसलमानों ने पहले ही कहा था कि यह शरीयत में हस्तक्षेप है
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बरेली, 15 सितंबर (आईएएनएस)। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर जहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू किया जाएगा, वहीं दूसरी ओर कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने यूसीसी को स्वीकार करने से इनकार किया है।

आईएएनएस से बातचीत में मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने मंत्री भूपेंद्र चौधरी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने अपनी पार्टी की लाइन के अनुसार बात कही है। हर व्यक्ति अपनी पार्टी की बात करता है और अपनी पार्टी के नजरिए की बात करता है। जहां तक समान नागरिक संहिता की बात है, तो इस सिलसिले में भारत के मुसलमानों ने बहुत पहले ही अपना नजरिया स्पष्ट कर दिया है कि यह शरीयत में हस्तक्षेप है। शरीयत में किसी भी तरह का हस्तक्षेप मुसलमानों के लिए काबिल-ए-कबूल नहीं है।

मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने केंद्रीय गृह मंत्री के 2029 से पहले 21 राज्यों में यूसीसी लागू करने के ऐलान पर कहा कि हमारा मानना है कि यूसीसी मुल्क के लिए फायदेमंद नहीं है, क्योंकि सब जानते हैं कि जब संविधान बना, तो उस वक्त भी यूसीसी को संविधान का अभिन्न हिस्सा नहीं रखा गया। सब लोग उस वक्त भी यह जानते थे कि अपना मुल्क ऐसा है, जहां हर सौ-दो सौ किलोमीटर पर संस्कृति, भाषा और रहन-सहन का तरीका बदलता है। फिर समुदायों में भी आप देखें तो एक ही समुदाय में कई तरह के रीति-रिवाज और सस्कृति हैं। लिहाजा ऐसे मुल्क में यूसीसी सब पर थोपा नहीं जा सकता।

दूसरी ओर, मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने कहा कि मसूद अजहर भारत का मोस्ट वांटेड आतंकवादी है। उस पर पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने जो जुर्माना लगाया है, वह जुर्माना और बढ़ा देना चाहिए। मसूद अजहर हमेशा भारत के खिलाफ गतिविधियों में सक्रिय रहा है और भारत में बहुत सारी घटनाओं को अंजाम देने में उसका हाथ रहा है। भारत आतंकवाद के खिलाफ जूझ रहा है और हम जैसे धार्मिक लोग भी आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाए हुए हैं। आतंकवाद को किसी एक मजहब से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। आतंकवाद एक बीमारी है और इसका खात्मा होना जरूरी है।

--आईएएनएस

डीकेएम/एबीएम