राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण दिवस: तिरंगा सिर्फ झंडा नहीं, भारत की आत्मा, शौर्य और बलिदान की अमर पहचान

राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण दिवस: तिरंगा सिर्फ झंडा नहीं, भारत की आत्मा, शौर्य और बलिदान की अमर पहचान

नई दिल्ली, 21 जुलाई (आईएएनएस)। 'तिरंगा'... केवल तीन रंगों से बना एक राष्ट्रीय ध्वज नहीं है। यह 140 करोड़ भारतीयों की पहचान, स्वाभिमान और गौरव का प्रतीक है। तिरंगे को देखते ही हर किसी के मन में देशभक्ति की भावना स्वतः जाग उठती है। यह लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, संघर्ष और बलिदान की याद दिलाता है, जिन्होंने 'मां भारती' को आजाद कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। हर बार जब तिरंगा शान से लहराता है, तो यह संदेश देता है कि भारत की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा सर्वोपरि है।

इसी गौरवशाली इतिहास को स्मरण करने के लिए हर वर्ष 22 जुलाई को राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण दिवस मनाया जाता है। 1947 में इसी दिन संविधान सभा ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे को आधिकारिक रूप से अपनाया था। यह निर्णय भारत की स्वतंत्रता से महज कुछ सप्ताह पहले लिया गया था और इसी के साथ तिरंगा स्वतंत्र भारत की पहचान बन गया।

22 जुलाई 1947 भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तिथियों में से एक है। इसी दिन संविधान सभा की बैठक में वर्तमान स्वरूप वाले तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया गया। इसके बाद, 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के साथ यही तिरंगा स्वतंत्र भारत के ऊपर पहली बार शान से फहराया गया। 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक यह डोमिनियन ऑफ इंडिया का राष्ट्रीय ध्वज रहा। इसके बाद 26 जनवरी 1950 को भारत के गणतंत्र बनने के साथ यही तिरंगा भारत गणराज्य का राष्ट्रीय ध्वज बन गया।

आज तिरंगे की पहचान केवल एक झंडे के रुप में नहीं है। यह भारत की संप्रभुता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज आयताकार होता है, जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 निर्धारित है। इसमें तीन समान आकार की क्षैतिज पट्टियां होती हैं। सबसे ऊपर केसरिया रंग – साहस, त्याग, शक्ति और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक। बीच में सफेद रंग – शांति, सत्य, पारदर्शिता और सद्भाव का संदेश देता है। तिरंगे के सबसे नीचे हरा रंग – समृद्धि, उर्वरता, विकास और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है।

सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का अशोक चक्र बना होता है। यह सारनाथ स्थित सम्राट अशोक के सिंह स्तंभ से लिया गया है और इसमें 24 तीलियां होती हैं। धर्म चक्र यह संदेश देता है कि जीवन और राष्ट्र दोनों निरंतर गतिशील रहने चाहिए। प्रगति का मार्ग कभी रुकना नहीं चाहिए।

आज जिस तिरंगे को हम गर्व के साथ सलाम करते हैं, वह एक दिन में तैयार नहीं हुआ। इसके वर्तमान स्वरूप तक पहुंचने के लिए कई बदलाव किए गए। 1931 में स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकय्या द्वारा प्रस्तावित ध्वज में बीच में चरखा था। बाद में इसे बदलकर अशोक चक्र शामिल किया गया, जिससे यह राष्ट्रीय ध्वज भारत की प्रगति, न्याय और सतत विकास का प्रतीक बन गया। इसके बाद, 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसी अंतिम स्वरूप को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मंजूरी दी।

राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना की याद नहीं है, बल्कि यह हर भारतीय को अपने राष्ट्रीय ध्वज के महत्व और उसके सम्मान के प्रति जागरूक करने का अवसर भी है।

इस दिन को मनाने का उद्देश्य तिरंगे के इतिहास और विरासत से नई पीढ़ी को परिचित कराना है। साथ ही, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना को मजबूत करना। स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को याद करना। संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान बढ़ाना और राष्ट्रभक्ति और नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता फैलाना है।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। राष्ट्रीय ध्वज कॉटन, सिल्क या खादी का ही होना चाहिए। तिरंगे पर किसी प्रकार का कुछ लिखना, चित्र बनाना या कोई निशान बनाना गैरकानूनी है। किसी भी परिस्थिति में तिरंगा जमीन को स्पर्श नहीं करना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज का उपयोग हमेशा सम्मान और गरिमा के अनुरूप किया जाना चाहिए।

सीमा पर तैनात सैनिक जब तिरंगे की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करते हैं, ओलंपिक में खिलाड़ी जब तिरंगा लहराते हैं, वैज्ञानिक जब अंतरिक्ष में भारत का परचम बुलंद करते हैं या किसी सरकारी भवन पर तिरंगा शान से फहराता है। हर बार यह करोड़ों भारतीयों के हृदय में गर्व का संचार करता है।

तिरंगा केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं बल्कि उन अनगिनत बलिदानों की विरासत है, जिनकी बदौलत भारत आज एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और संप्रभु राष्ट्र के रूप में विश्व मंच पर गर्व से खड़ा है। तिरंगे का सम्मान करना हर भारतीय का नैतिक और राष्ट्रीय कर्तव्य भी है।

--आईएएनएस

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