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तमिलनाडुः नीलगिरि में बारिश की कमी का असर चाय की पत्तियों के उत्पादन पर पड़ा

तमिलनाडुः

कोयंबटूर, 31 अगस्त (आईएएनएस)। तमिलनाडु के नीलगिरी में चाय उत्पादक हरी पत्तियों के उत्पादन में भारी गिरावट से जूझ रहे हैं, क्योंकि दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश में भारी कमी के कारण बागानों में मिट्टी में नमी की कमी हो गई है।

छोटे चाय उत्पादकों का कहना है कि इस सीजन में उत्पादन में आई गिरावट अभूतपूर्व है। जिन बागानों से आम तौर पर हर महीने प्रति एकड़ लगभग 500 किलोग्राम हरी पत्तियां मिलती थीं, वहां अब केवल 200 किलोग्राम के आसपास ही उत्पादन हो रहा है।

उत्पादकों ने इसे कई दशकों में देखी गई सबसे बड़ी गिरावट बताया है। कुछ किसानों ने लंबे समय तक चले सूखे से अपने बागानों को बचाने के लिए स्प्रिंकलर लगाए हैं। हालांकि, सिंचाई के उपकरण खरीदने और चलाने का खर्च कई छोटे उत्पादकों के लिए बहुत अधिक है, जो जिले के चाय सेक्टर का एक बड़ा हिस्सा है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बीच-बीच में हुई बारिश से बागानों को बारिश की कमी का कुछ समय तक सामना करने में मदद मिली है। कमी का पूरा असर शायद तभी पता चलेगा, जब आने वाले दिनों में भी सूखा जारी रहे।

आम तौर पर चाय की सालाना औसत पैदावार सात से आठ टन प्रति एकड़ आंकी जाती है, लेकिन अगर इस इलाके में और बारिश नहीं हुई, तो यह पैदावार 50 प्रतिशत तक गिर सकती है। मौजूदा सीजन में ही पैदावार में अनुमानित 10 से 20 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है।

लंबे समय तक नमी की कमी से लगातार होने वाली कटाई के बीच का समय भी बढ़ सकता है। इससे प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों को सप्लाई की जाने वाली हरी पत्तियों की मात्रा और कम हो जाएगी और किसानों की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।

पैदावार में भारी गिरावट के बावजूद खरीद की कीमतें 20 रुपये प्रति किलोग्राम से कम ही बनी हुई हैं, जिससे किसानों को बहुत कम राहत मिल रही है। जानकारों का कहना है कि चाय की कीमतें मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियों से तय होती हैं।

नतीजतन, नीलगिरी में कम पैदावार का मतलब यह नहीं था कि स्थानीय स्तर पर तोड़ी गई पत्तियों की कीमतें बढ़ जाएंगी। दक्षिण-पश्चिम मानसून, जो आम तौर पर जून से अगस्त तक रहता है, ऊटी और गुडलूर में चाय के बागानों के लिए बहुत अहम है।

कोटागिरी को दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व, दोनों मानसून से फायदा मिलता है, जबकि कूनूर में अधिकतर बारिश उत्तर-पूर्व मानसून के दौरान होती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के खत्म होने के साथ, नीलगिरि में कुल मिलाकर लगभग 55 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है, जिसकी वजह 'सुपर अल नीनो' का असर बताया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि पिछले 15 सालों में जिले में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान बारिश की यह सबसे बड़ी कमी है।

अब किसान उत्तर-पूर्व मानसून पर उम्मीदें लगाए हुए हैं। जिले के चाय उगाने वाले इलाकों में मिट्टी की नमी को फिर से लाने, पैदावार बढ़ाने और और अधिक नुकसान को रोकने के लिए आने वाले मौसम में अच्छी बारिश होना जरूरी माना जा रहा है।

--आईएएनएस

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