नागपुर, 25 जुलाई (आईएएनएस)। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे देशभर के छात्रों के आंदोलन की बड़ी जीत बताया। देशमुख ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के पिछले 12 वर्षों के कार्यकाल में यह पहला मौका है, जब किसी केंद्रीय मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है और इसके पीछे छात्रों का व्यापक विरोध-प्रदर्शन और जनदबाव प्रमुख कारण रहा।
अनिल देशमुख ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान ने भले ही देर से इस्तीफा दिया हो, लेकिन यह देशभर के विद्यार्थियों की एकजुटता और संघर्ष का परिणाम है। पूरे देश में छात्रों के बीच जिस तरह का आक्रोश देखने को मिला, उसके आगे आखिरकार केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा। यदि केंद्र सरकार 15 से 20 दिन पहले ही धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा ले लेती, तो देशभर में जो तनावपूर्ण स्थिति बनी और जिन घटनाओं में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई हुई, उन्हें टाला जा सकता था।
देशमुख ने आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और पेलेट बुलेट जैसी कार्रवाई की गई, जिसे समय रहते सरकार रोक सकती थी। सरकार ने शुरुआत में छात्रों की ताकत को कमतर आंका, लेकिन अंततः उसे उनके दबाव के आगे झुकना पड़ा।
आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अभिजीत दीपके और उनके साथियों की सराहना करते हुए पूर्व गृह मंत्री ने कहा कि पूरे देश के विद्यार्थियों ने जिस एकता और संगठन का परिचय दिया, वह इस आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता है। यह केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे देश के छात्रों की जीत है और इसके लिए सभी विद्यार्थियों को बधाई दी जानी चाहिए। इस पूरे घटनाक्रम में संविधान की भावना की जीत हुई है। लोकतंत्र में जनता और विशेष रूप से युवाओं की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। छात्रों ने यह साबित कर दिया कि संगठित होकर अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से रखी जाए तो सरकार को भी निर्णय बदलने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए देशमुख ने कहा कि यदि आंदोलन की शुरुआत में ही केंद्र सरकार ने संवाद का रास्ता अपनाया होता तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। जब सोनम वांगचुक अनशन पर बैठे थे, उसी समय यदि कोई वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री उनसे बातचीत करने पहुंचता और छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करता, तो आंदोलन को इतना लंबा नहीं खिंचना पड़ता। सरकार ने शुरुआती दिनों में यह सोचकर आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया कि छात्र ज्यादा प्रभाव नहीं डाल पाएंगे, लेकिन लगातार बढ़ते जनसमर्थन और छात्रों की एकजुटता के कारण अंततः सरकार को पीछे हटना पड़ा और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार करना पड़ा।
छात्रों के संघर्ष की सराहना करते हुए देशमुख ने आगे कहा कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की जीत है।