Advertisement banner

महेश सचदेव ने ब्रिक्स सम्मेलन को बताया बहुध्रुवीय व्यवस्था का अहम मंच

ब्रिक्स

नई दिल्ली, 8 सितंबर (आईएएनएस)। पूर्व राजदूत महेश सचदेव ने भारत में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर बताया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में दुनिया यूक्रेन-रूस युद्ध, अमेरिका-ईरान टकराव, व्यापारिक प्रतिबंधों और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान जैसी कई चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे समय में ब्रिक्स देशों का एक मंच पर आना वैश्विक समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

महेश सचदेव ने कहा कि 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत में हो रहा है और यह चौथी बार है जब भारत इसकी मेजबानी कर रहा है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने इस सम्मेलन के महत्व को और बढ़ा दिया है। उन्होंने यूक्रेन-रूस युद्ध और अमेरिका-ईरान टकराव का उल्लेख करते हुए कहा कि इन संघर्षों का असर संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि पूरी दुनिया पर इसका आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव पड़ा है। इन संघर्षों के कारण खाद्य पदार्थों, तेल, गैस और उर्वरकों की कीमतों पर दबाव बढ़ा है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं प्रभावित हुई हैं।

उन्होंने कहा कि युद्धों को समाप्त करने के लिए अब तक किए गए प्रयास अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं, क्योंकि संबंधित पक्ष किसी ऐसे समाधान पर सहमत नहीं हो सके हैं जिसे सभी स्वीकार कर सकें।

पूर्व राजदूत ने अमेरिकी प्रतिबंधों और व्यापारिक नीतियों से पैदा हुए व्यवधान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आर्थिक प्रतिबंधों और व्यापार में रुकावटों से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा है और मंदी की आशंका भी मजबूत हुई है। ऐसी परिस्थिति में ब्रिक्स सम्मेलन में बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिनिधियों को एक साथ बैठकर वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियों पर चर्चा करने का अवसर मिलेगा। भारत को अपनी मेजबानी का इस दिशा में प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए।

सचदेव ने कहा कि पश्चिमी देश ब्रिक्स को कुछ हद तक संदेह की नजर से देखते हैं। पश्चिम में यह धारणा है कि संगठन पर चीन और रूस का प्रभाव अधिक है और इसकी दिशा पश्चिमी देशों के विरोध में जा सकती है। उन्होंने ब्रिक्स के तहत विकसित संस्थागत व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए न्यू डेवलपमेंट बैंक और कंटिजेंसी रिजर्व अरेंजमेंट (सीआरए) जैसी पहलों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि डी-डॉलराइजेशन की चर्चा और इन संस्थागत पहलों के कारण पश्चिमी देशों में यह आशंका पैदा हुई है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकसित वैश्विक वित्तीय ढांचे को चुनौती मिल सकती है।

महेश सचदेव ने कहा कि इन परिस्थितियों में ब्रिक्स की मेजबानी भारत को एक विशिष्ट कूटनीतिक भूमिका निभाने का अवसर देती है। उन्होंने भारत को ब्रिक्स और पश्चिमी देशों के बीच एक संभावित सेतु बताया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत न तो ब्रिक्स के भीतर पश्चिम-विरोधी रुख का समर्थन करने वाला देश है और न ही पश्चिमी देशों के समूह का हिस्सा है। यही स्थिति भारत को सम्मेलन में अलग भूमिका निभाने की क्षमता देती है। भारत ब्रिक्स के भीतर आने वाले प्रस्तावों और संयुक्त घोषणाओं को संतुलित एवं व्यावहारिक दिशा देने का प्रयास कर सकता है, ताकि उनका रुख किसी एक ध्रुव के पक्ष या विरोध में जाने के बजाय समाधान की ओर हो।

पूर्व राजदूत ने कहा कि ब्रिक्स सम्मेलन में यूक्रेन-रूस युद्ध, अमेरिका-ईरान संघर्ष और वैश्विक टैरिफ विवाद जैसे मुद्दों पर चर्चा का अवसर है। इन समस्याओं का समाधान किसी एक पक्ष के हित में ध्रुवीकरण के जरिए नहीं, बल्कि ऐसे संतुलित दृष्टिकोण से होना चाहिए जिस पर व्यावहारिक रूप से अमल किया जा सके। उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत अपनी मेजबानी के जरिए ऐसे प्रस्तावों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाएगा जो टकराव बढ़ाने के बजाय संवाद और समाधान को प्रोत्साहित करें।

सचदेव ने कहा कि ब्रिक्स उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावी भूमिका देने वाला मंच बन सकता है। मौजूदा वैश्विक अस्थिरता के बीच संगठन के देशों का एक साथ आना आर्थिक सहयोग, आपूर्ति श्रृंखलाओं की स्थिरता और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। उन्होंने आगे कहा कि भारत के पास इस सम्मेलन को केवल एक औपचारिक बैठक तक सीमित रखने के बजाय वैश्विक चुनौतियों पर व्यावहारिक और संतुलित समाधान तलाशने के मंच के रूप में इस्तेमाल करने का महत्वपूर्ण अवसर है।

--आईएएनएस

पीएसके/डीएससी