नई दिल्ली, 27 जुलाई (आईएएनएस)। स्मार्टफोन का गर्म हो जाना, लैपटॉप का लंबे समय तक काम करने के बाद ओवरहीट होना, डेटा सेंटरों में लगातार बढ़ती गर्मी या रक्षा उपकरणों को ओवर हीटिंग से बचाना एक बड़ी चुनौती है। दरअसल ओवर हीटिंग, आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक हैं। इसी समस्या को देखते हुए अब आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने एक नया और प्रभावी समाधान विकसित किया है। इस समाधान से स्मार्टफोन और लैपटॉप कम गर्म होंगे और लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन करेंगे।
डेटा सेंटर अधिक प्रभावी कूलिंग के साथ संचालित हो सकेंगे। रक्षा क्षेत्र में रडार, एवियोनिक्स और अन्य उच्च क्षमता वाले इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम अधिक भरोसेमंद बनेंगे। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों और पावर कन्वर्टर में भी भविष्य में इसका उपयोग किया जा सकता है। आईआईटी मद्रास के शोधकर्ताओं ने फ्लैट प्लेट पल्सेटिंग हीट पाइप (एफपीपीएचपी) का एक नया डिजाइन तैयार किया है। यह एक ऐसा डिजाइन है, जो कम जगह में भी अधिक प्रभावी ढंग से गर्मी बाहर निकाल सकता है। यह तकनीक भविष्य में स्मार्टफोन, लैपटॉप, डेटा सेंटर, रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस सिस्टम और इलेक्ट्रिक वाहनों तक में इस्तेमाल की जा सकती है।
दरअसल यह नई तकनीक संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में छोटे होते इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में ओवरहीटिंग का समाधान भारतीय वैज्ञानिकों के इस नवाचार से काफी हद तक संभव हो सकता है। आईआईटी के मुताबिक इसे एक ऐसे सूक्ष्म कूलिंग सिस्टम की तरह समझा जा सकता है, जो बिना किसी मोटर या पंप के अपने आप गर्मी को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा देता है। इसमें एक सपाट धातु प्लेट के भीतर बेहद महीन नलिकाएं बनाई जाती हैं। इन नलिकाओं में विशेष द्रव भरा होता है। जैसे ही कोई हिस्सा गर्म होता है, द्रव वाष्प बनकर ठंडे हिस्से तक पहुंचता है, वहां दोबारा तरल बन जाता है और वापस लौट आता है।
यही प्रक्रिया लगातार चलती रहती है और उपकरण का तापमान नियंत्रित रहता है। अब तक ऐसे अधिकांश कूलिंग सिस्टम में गर्मी लेने वाला हिस्सा और गर्मी छोड़ने वाला हिस्सा प्लेट की एक ही तरफ होता था। आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने पहली बार ‘एंटीपैरलल डिजाइन’ तैयार किया है। इसमें दोनों हिस्से प्लेट की विपरीत सतहों पर लगाए गए हैं। इससे बेहद छोटे और कॉम्पैक्ट इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में भी इस तकनीक को आसानी से लगाया जा सकता है।
शोधकर्ताओं ने इस कूलिंग सिस्टम के दो मॉडल बनाए एक है सिलिकॉन गैस्केट आधारित व दूसरा है ओ-रिंग आधारित। परीक्षण में सामने आया कि गैस्केट मॉडल में द्रव अधिक भरता है, लेकिन ओ-रिंग मॉडल में वही द्रव कहीं अधिक तेजी और प्रभावी ढंग से आगे-पीछे गति करता है। परिणामस्वरूप कूलिंग क्षमता काफी बढ़ गई। शोध में एक और रोचक परिणाम सामने आया। सामान्य धारणा के विपरीत, इस डिजाइन में एल्युमिनियम ने तांबे से बेहतर प्रदर्शन किया।
आईआईटी का कहना है कि एल्युमिनियम न केवल हल्का है, बल्कि इसका तापीय प्रतिरोध तांबे की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत कम पाया गया। इससे बड़े पैमाने पर निर्माण की लागत और वजन दोनों कम किए जा सकते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने नलिकाओं की भीतरी सतह को विशेष तरीके से तैयार किया, जिससे द्रव सतह पर अधिक अच्छी तरह फैलने लगा। इस एक बदलाव से तापीय प्रतिरोध में करीब 16 प्रतिशत की अतिरिक्त कमी दर्ज की गई और गर्मी निकालने की क्षमता और बढ़ गई। यदि यह तकनीक व्यावसायिक स्तर पर अपनाई जाती है तो इसके उपयोग की संभावनाएं बेहद व्यापक हैं।