कावेरी डेल्टा के किसानों पर तिहरी मार, भूजल घटा, खारा पानी बढ़ा और मेट्टूर बांध का पानी अब भी नहीं मिला

कावेरी डेल्टा के किसानों पर तिहरी मार, भूजल घटा, खारा पानी बढ़ा और मेट्टूर बांध का पानी अब भी नहीं मिला

तंजावुर, 25 जुलाई (आईएएनएस)। कावेरी डेल्टा के कुछ हिस्सों में कुरुवई धान की खेती गंभीर संकट का सामना कर रही है। किसान तेजी से घटते भूजल स्तर, भूजल में बढ़ती लवणता (खारापन) और मेट्टूर बांध से अब तक पानी नहीं छोड़े जाने की तिहरी मार झेल रहे हैं।

स्थिति को भीषण गर्मी ने और अधिक गंभीर बना दिया है, जिससे खेतों में पानी का तेजी से वाष्पीकरण हो रहा है। वहीं, कृषि पंपों के लिए मुफ्त बिजली आपूर्ति की अवधि में कटौती ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

तंजावुर जिले के पापनासम, तिरुवैयारु और आसपास के क्षेत्रों के किसानों का कहना है कि इस सीजन में वे लगभग पूरी तरह भूजल के सहारे अपनी खड़ी कुरुवई फसल को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

बुधवार को टैन्जेडको द्वारा किसानों को यह जानकारी दिए जाने के बाद उनकी चिंता और बढ़ गई कि कृषि पंप सेटों के लिए प्रतिदिन मिलने वाली मुफ्त बिजली आपूर्ति 18 घंटे से घटाकर 14 घंटे कर दी जाएगी। इससे सिंचाई के लिए भूजल निकालने की उनकी क्षमता सीमित हो जाएगी।

कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, तंजावुर जिले में लगभग एक लाख एकड़ क्षेत्र में भूजल के सहारे कुरुवई की खेती की गई है।

सामान्य परिस्थितियों में किसान शुरुआत में भूजल से सिंचाई करते हैं और बाद में मेट्टूर बांध से छोड़े गए कावेरी के पानी पर निर्भर हो जाते हैं ताकि फसल को आगे बढ़ाया जा सके।

लेकिन इस वर्ष, जलाशय में पर्याप्त जल भंडारण नहीं होने के कारण हर साल 12 जून को किया जाने वाला पानी का वार्षिक प्रवाह नहीं हो सका। इसके चलते किसानों को पूरी तरह भूजल पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

किसानों का कहना है कि लंबे समय से नदी में पानी नहीं बहने के कारण भूजल स्तर में लगातार गिरावट आ रही है।

पापनासम के गणपति अग्रहारम के किसान आर. अरुलसामी ने कहा कि भीषण गर्मी के कारण खेतों से पानी तेजी से वाष्पित हो रहा है, जबकि पिछले छह महीने से अधिक समय से कावेरी में पानी का प्रवाह नहीं हुआ है। भूजल स्तर हर दिन नीचे जा रहा है।

पापनासम ब्लॉक में स्थिति सबसे अधिक गंभीर है, जहां लगभग 8,400 एकड़ में कुरुवई की खेती की गई है। इनमें से करीब 2,000 एकड़ में कटाई पूरी हो चुकी है, लेकिन बाकी खेतों में खेती कर रहे किसानों को सिंचाई संकट गहराने की आशंका है।

एक और बड़ी चिंता वेल्लम पेरम्बुर, थेन पेरम्बुर, अल्लूर अजीसिकुडी और पनावेली जैसे गांवों में भूजल की बढ़ती लवणता है।

किसानों का कहना है कि पिछले वर्षों में मेट्टूर बांध से समय पर छोड़े गए पानी से नहरों के माध्यम से भूजल का पुनर्भरण (रिचार्ज) होता था और इससे भूजल का खारापन भी कम हो जाता था।

इस बार ऐसा नहीं होने के कारण खारा भूजल सिंचाई को प्रभावित कर रहा है और फसल के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन गया है।

कई किसानों ने तमिलनाडु सरकार से अपील की है कि 3 अगस्त को पड़ने वाले आदि पेरुक्कु पर्व से पहले मेट्टूर बांध से कम से कम सीमित मात्रा में पानी छोड़ दिया जाए, ताकि किसानों को कुछ राहत मिल सके।

हालांकि, कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान जल भंडारण की स्थिति को देखते हुए ऐसा होना मुश्किल है।

सीनियर एग्रो टेक्नोलॉजिस्ट फोरम के पी. कलैवानन ने बताया कि मेट्टूर जलाशय में इस समय केवल लगभग 35 टीएमसी फीट पानी है, जबकि इसकी कुल क्षमता 93.47 टीएमसी फीट है।

उन्होंने कहा कि पहले अगस्त में बांध खोले जाने की उम्मीद थी, लेकिन मौजूदा जल भंडारण को देखते हुए अब सितंबर से पहले पानी छोड़े जाने की संभावना नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि पूर्वोत्तर मानसून से पर्याप्त वर्षा होती है, तो किसान सितंबर में मध्यम अवधि वाली सांबा धान की सीधी बुवाई (डायरेक्ट सोइंग) अपनाकर आगामी सीजन को अब भी बचा सकते हैं।

--आईएएनएस

एसएके/एएस