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कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को मिल रही धमकियों ने बढ़ाई चिंता, बोले- 90 के दशक का डर दोबारा नहीं लौटने देंगे

कश्मीरी

जम्मू, 29 अगस्त (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कश्मीर घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की ओर से धमकी भरे पत्र मिलने के बाद एक बार फिर सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। इन धमकियों में कर्मचारियों की पहचान, फोन नंबर, तस्वीरें और वाहनों से जुड़ी जानकारी तक का उल्लेख किए जाने की बात सामने आई है।

कश्मीरी पंडित समुदाय से जुड़े एक व्यक्ति ने इसे सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि लगातार मिल रहे ऐसे पत्र डर का माहौल पैदा कर रहे हैं। लेकिन, 90 के दशक का डर दोबारा नहीं लौटने देंगे।

कश्मीरी पंडित समुदाय के एक व्यक्ति ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि यह कोई पहली धमकी नहीं है। अगस्त के पहले सप्ताह में एक धमकी सामने आई थी, इसके बाद 23 अगस्त को और फिर 25 अगस्त को भी धमकी पत्र सामने आया। एक ही महीने में बार-बार इस तरह के पत्र सामने आना चिंता का विषय है। खासकर तब, जब इन पत्रों में नाम, मोबाइल नंबर, तस्वीरें और वाहन का नंबर और रंग जैसी जानकारियां शामिल होने की बात कही जा रही है। सुरक्षा एजेंसियों के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि इतनी व्यक्तिगत जानकारी धमकी देने वालों तक कैसे पहुंच रही है?

उन्होंने कहा कि 1990 के दशक में आतंक और हिंसा के माहौल के कारण बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी थी। उस दौर की यादें आज भी समुदाय के लोगों के मन में मौजूद हैं। ऐसे में घाटी में रोजगार के लिए वापस गए कर्मचारियों को धमकी मिलने से स्वाभाविक रूप से चिंता बढ़ती है। उन्होंने प्रधानमंत्री पैकेज के तहत घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों का जिक्र करते हुए कहा कि अगर सरकार इन कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पाती है, तो भविष्य में घाटी में समुदाय की व्यापक वापसी और पुनर्वास को लेकर भी सवाल खड़े होंगे।

धमकी पत्रों में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों पर आरएसएस और भाजपा के एजेंडे पर काम करने का आरोप लगाए जाने को लेकर भी उन्होंने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि घाटी में काम करने वाले लोग किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत नहीं गए हैं। वे रोजगार और अपने परिवारों का पालन-पोषण करने के लिए वहां गए हैं।

उन्होंने कहा कि देश के प्रति उनका विश्वास और भारतीय होने पर गर्व को किसी राजनीतिक संगठन से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। वे अपने देश के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं और देश उनके लिए सर्वोपरि है। धमकी देने वाले संगठनों की ओर से लोगों पर राजनीतिक या वैचारिक ठप्पा लगाना भी डर पैदा करने की रणनीति का हिस्सा है। कश्मीरी पंडितों ने पहले भी मुश्किल हालात का सामना किया है और अब केवल धमकी के कारण वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।

इस दौरान कमीडियन समय रैना के शो 'इंडियाज गॉट लेटेंट 2' के लेटेस्ट एपिसोड में कथित तौर पर कश्मीरी पंडितों को लेकर की गई टिप्पणी पर उन्होंने कहा कि लंबे समय तक राजनीतिक दलों पर कश्मीरी पंडितों के नाम का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया जाता रहा, लेकिन अब सोशल मीडिया और यूट्यूब से जुड़े लोग भी समुदाय के नाम और उसके विस्थापन को लेकर टिप्पणी कर रहे हैं। बाहर से किसी घटना पर टिप्पणी करना आसान है, लेकिन जिस व्यक्ति ने अपना घर छोड़ा हो, उसके दर्द को समझना आसान नहीं है। 1990 के दशक में जब परिवारों ने घाटी छोड़ी तो कई लोगों के पास रहने के लिए स्थायी छत और पर्याप्त आर्थिक साधन तक नहीं थे। उन्हें अलग-अलग राज्यों में कठिन परिस्थितियों में जीवन शुरू करना पड़ा।

उन्होंने कहा कि इन परिवारों ने तमाम परेशानियों के बावजूद अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। आज उन्हीं परिवारों की अगली पीढ़ी डॉक्टर, इंजीनियर और बड़ी कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर पहुंची है। यह संघर्ष और मेहनत समुदाय की पूरी कहानी का हिस्सा है, जिसे किसी मजाक या हल्की टिप्पणी में समेटना उचित नहीं है। अगर किसी ने समुदाय की पीड़ा को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की है तो उसे अपने शब्दों पर विचार करना चाहिए और माफी मांगनी चाहिए।

उन्होंने विस्थापन के दर्द को समझाने के लिए कहा कि अगर एक चिड़िया का घोंसला भी टूट जाए तो वह बेचैन हो जाती है, जबकि कश्मीरी पंडितों ने अपने घर, संपत्ति और जड़ों से दूर होने का दर्द झेला है।

'इंडियाज गॉट लेटेंट 2' के लेटेस्ट एपिसोड में शेरोन वर्मा ने समय रैना के बिहारी बैकग्राउंड वाले मजाक का जवाब देते हुए कहा, "कम से कम, मैंने अपनी मर्जी से अपना राज्य छोड़ा।"

--आईएएनएस

पीआईएम/एबीएम