कश्मीरी पंडित नर्स हत्या केस में बड़ा अपडेट, 35 वर्ष बाद 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल

कश्मीरी पंडित नर्स हत्या केस में बड़ा अपडेट, 35 वर्ष बाद 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल

श्रीनगर, 29 जून (आईएएनएस)। कश्मीरी पंडित स्टाफ नर्स सरला भट्ट के अपहरण, उन पर अत्याचार और बेरहमी से हुई हत्या के 35 वर्ष से ज्यादा समय बाद जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एसआईए) ने सोमवार को आखिरकार अदालत में इस मामले में चार्जशीट दाखिल कर दी है।

एसआईए ने शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसकेआईएमएस), श्रीनगर की स्टाफ नर्स सरला भट्ट के अपहरण, टॉर्चर और बेरहमी से हत्या के मामले में श्रीनगर में टाडा/पोटा और एनआईए एक्ट के तहत नियुक्त स्पेशल जज की अदालत में 737 पेज की एक विस्तृत चार्जशीट दाखिल की है। सरला भट्ट की हत्या 18 अप्रैल, 1990 को जेकेएलएफ के आतंकवादियों ने कर दी थी।

यह मामला जम्मू-कश्मीर के डीजीपी के आदेश पर 18 मार्च, 2024 को एसआईए जम्मू-कश्मीर को ट्रांसफर किया गया था। लंबी जांच के बाद तैयार की गई इस बड़ी चार्जशीट में एसआईए कश्मीर द्वारा बारीकी से विश्लेषण किए गए मौखिक, दस्तावेजी, फोरेंसिक, बैलिस्टिक, मेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को एक साथ लाया गया है।

लगभग 35 वर्ष बाद चार्जशीट दाखिल करना आतंकवाद के पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है और जम्मू-कश्मीर में पुराने आतंकी अपराधों की जांच में सबसे बड़ी कामयाबियों में से एक है।

इससे भी अहम बात यह है कि चार्जशीट एक मजबूत और साफ संदेश देती है कि समय कभी भी आतंकवाद के लिए ढाल नहीं बन सकता। चाहे कितने भी वर्ष बीत जाएं, आतंकवादी अत्याचारों के लिए जिम्मेदार लोग कानून के सामने जवाबदेह बने रहेंगे।

यह मामला दिखाता है कि भले ही आतंकवाद डर, धमकी और हिंसा के जरिए न्याय में देरी कर सकता है, लेकिन यह कभी भी कानून के शासन को हमेशा के लिए नहीं हरा सकता। यह मामला कश्मीर में आतंकवाद के शुरुआती दौर में किए गए सबसे बर्बर आतंकी अपराधों में से एक से जुड़ा है।

सरला भट्ट का 18 अप्रैल, 1990 को एसकेआईएमएस के पास से अपहरण कर लिया गया था। उनके साथ बेरहमी से टॉर्चर किया गया और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उसके बाद श्रीनगर की उमर कॉलोनी, मालबाग में ऑटोमैटिक राइफल से गोली मारकर उनकी भयानक हत्या कर दी गई।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के चरम दौर के दौरान बने असाधारण हालात के कारण यह मामला दशकों तक अनसुलझा रहा। आतंकवादी संगठनों द्वारा पैदा किए गए डर, धमकी और आतंक के माहौल ने गवाहों के सामने आने और जरूरी बातें बताने की क्षमता पर बुरा असर डाला था।

आतंकवादी संगठनों ने ऐसा माहौल बना दिया था, जहां धमकियों और हिंसा के जरिए चुप्पी बनाए रखी जाती थी, जिससे कई जघन्य अपराध डर और जबरदस्ती की परतों के नीचे दबे रह गए।

सरला भट्ट का मामला आतंकवाद के उस काले अध्याय का प्रतीक बन गया, जिसने कश्मीर घाटी को अपनी चपेट में ले लिया था। फिर भी, न तो पीड़ित की याद धुंधली पड़ी और न ही न्याय की चाहत कम हुई। मार्च 2024 में एसआईए कश्मीर को सौंपे जाने के बाद इस मामले की व्यापक जांच की गई।

साढ़े तीन दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद जांचकर्ताओं ने सुरक्षित गवाहों के बयानों, स्वतंत्र चश्मदीदों के बयानों, फोरेंसिक और बैलिस्टिक विश्लेषण, मेडिकल सबूतों, दस्तावेजी रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों और बड़े पैमाने पर की गई फील्ड जांच के जरिए घटनाओं के क्रम को बहुत बारीकी से फिर से तैयार किया।

जांच से यह साबित हो गया है कि सरला भट्ट की हत्या हिंसा की कोई अलग-थलग घटना नहीं थी, बल्कि यह जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के कमांड और कंट्रोल में रची गई एक बड़ी आतंकवादी साजिश का हिस्सा थी।

जांच में अपहरण और बेरहमी हत्या की योजना बनाने और उसे अंजाम देने में जेकेएलएफ के तत्कालीन चीफ कमांडर मोहम्मद यासीन मलिक के साथ-साथ खुर्शीद अहमद चालकू, अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सूफी उर्फ ​​इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की भूमिका का पता चला है।

जहां अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सूफी उर्फ ​​इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है, वहीं मोहम्मद यासीन मलिक अभी किसी दूसरे मामले में न्यायिक हिरासत में है।

फरार आतंकवादी खुर्शीद अहमद चालकू के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, जिसमें उद्घोषणा की प्रक्रिया भी शामिल है, शुरू कर दी गई है। चार्जशीट में उसे ही वह व्यक्ति बताया गया है, जिसने ट्रिगर दबाया था, और माना जाता है कि वह पाकिस्तान के कब्जे वाले पीओके भाग गया है।

चार्जशीट में आरपीसी की धारा 364, 341, 302 (धारा 34 के साथ), 201 और 120-बी; आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1987 (टीएडीए) की धारा 3(2), 3(3), 4 और 6; और भारतीय शस्त्र अधिनियम, 1959 की धारा 7 और 27 के तहत दंडनीय अपराधों को स्थापित किया गया है।

जांच में यह भी साबित हुआ है कि सरला भट्ट को 'मुखबिर' बताने का आरोप पूरी तरह से झूठा था और यह आतंकवादियों द्वारा पहले से सोची-समझी हत्या को सही ठहराने के लिए गढ़ा गया एक बहाना था। जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों से पता चलता है कि यह हत्या जेकेएलएफ के उस सुनियोजित अभियान का हिस्सा थी, जिसका मकसद निर्दोष नागरिकों - खासकर कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों - में डर फैलाना, उन्हें कश्मीर घाटी से जबरन विस्थापित करने के हालात बनाना और आतंकवादी संगठन के अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ाना था।

35 वर्ष बाद इस जांच का सफल समापन इस बात की एक जबरदस्त याद दिलाता है कि समय बीतने के साथ आपराधिक जवाबदेही खत्म नहीं होती। आतंकवादियों, अलगाववादियों, ओवरग्राउंड वर्करों और आतंकवादी साजिशों में शामिल सभी लोगों को यह समझना चाहिए कि कानून न्याय दिलाने के लिए हमेशा सख्ती से काम करता है।

अपराधियों को जवाबदेही से बचाने के लिए समय, छिपने की जगह या भौगोलिक दूरी, इनमें से कोई भी चीज हमेशा के लिए काम नहीं आ सकती।

737 पन्नों की यह चार्जशीट सिर्फ एक जांच का नतीजा नहीं है। यह उस पीड़ित की याद को सम्मान देने का जरिया है, जिसे दशकों तक न्याय नहीं मिला। यह कानून के शासन को फिर से मजबूत करने और आतंकवाद के अनगिनत पीड़ितों और उनके परिवारों को उम्मीद जगाने वाला संदेश है।

यह दिखाता है कि हर पीड़ित अहम है, हर अपराध की जांच होगी और दोषियों को न्याय व्यवस्था के सामने लाने की हर मुमकिन कोशिश की जाएगी। यह अहम जांच एसआईए कश्मीर और भारत सरकार के उस पक्के इरादे का सबूत है, जिसके तहत वे सबसे पुराने अनसुलझे आतंकवादी अपराधों की सच्चाई सामने लाने और दोषियों को जवाबदेह ठहराने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

यह एक मजबूत और साफ संदेश देता है कि आतंकवाद के मामलों में समय की कोई सीमा नहीं होती, न्याय की याददाश्त लंबी होती है और कानून आखिरकार उन लोगों तक पहुंच ही जाता है जो सोचते हैं कि वे डर, हिंसा या समय बीतने के साथ जवाबदेही से बच सकते हैं।

--आईएएनएस

डीके/डीकेपी