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जेपीएससी प्री में अनियमितताओं की सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

जेपीएससी

नई दिल्ली, 24 अगस्त (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में झारखंड कंबाइंड सिविल सर्विसेज प्रीलिमिनरी एग्जामिनेशन-2025 में कथित गड़बड़ियों की जांच को राज्य पुलिस की सीआईडी से सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) को ट्रांसफर करने की मांग की गई है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन की याचिका पर नोटिस जारी किया।

याचिका में 19 अप्रैल को झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) द्वारा आयोजित प्रारंभिक परीक्षा में कथित अनियमितताओं और गड़बड़ियों की स्वतंत्र, निष्पक्ष, व्यापक और समयबद्ध सीबीआई जांच की मांग की गई है। इसमें जांच को राज्य के आपराधिक जांच विभाग (सीआईडी) से सीबीआई को स्थानांतरित करने की मांग की गई है। तर्क यह है कि इन आरोपों की जांच के लिए राज्य की भर्ती प्रणाली के कामकाज की जांच जरूरी है, जिसमें अधिकारियों, परीक्षा-केंद्र के कर्मचारियों, तकनीकी एजेंसियों, स्कैनिंग और मूल्यांकन एजेंसियों और अन्य सेवा प्रदाताओं की संभावित भूमिका शामिल है।

याचिका के अनुसार, राज्य सीआईडी ने पहले ही मामला दर्ज कर लिया था और जांच के दौरान सफल उम्मीदवारों से उनके पेपर-I और पेपर-II की ओएमआर कार्बन कॉपी जमा करने को कहा था।

याचिका में तर्क दिया गया है कि उम्मीदवारों के पास मौजूद ओएमआर कार्बन कॉपी का स्वतंत्र रूप से मिलान जेपीएससी और उसके सेवा प्रदाताओं द्वारा रखे गए मूल ओएमआर शीट, स्कैन की गई छवियों, कोडिंग और डिकोडिंग रिकॉर्ड, मूल्यांकन डेटा और परिणाम-निर्माण रिकॉर्ड से किया जा सकता है।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि सीबीआई जांच का अनुरोध राज्य सीआईडी अधिकारियों के खिलाफ किसी व्यक्तिगत आरोप पर आधारित नहीं है बल्कि आरोपों की प्रकृति और गंभीरता तथा जांच के विषय से जुड़ी राज्य मशीनरी से स्वतंत्र एजेंसी की आवश्यकता पर आधारित है।

याचिका में आगे तर्क दिया गया है कि प्रारंभिक परीक्षा को बाद में रद्द करने से स्वतंत्र जांच की आवश्यकता खत्म नहीं होती है। याचिकाकर्ता ने कहा, "परीक्षा रद्द होने से ऐसी स्वतंत्र जांच की आवश्यकता खत्म नहीं होती है।"

उन्होंने तर्क दिया कि यह पता लगाना अभी भी आवश्यक है कि परीक्षा प्रक्रिया से किस हद तक समझौता किया गया, कथित अनियमितताओं का तरीका क्या था और इसके लिए कौन से व्यक्ति या एजेंसियां ​​जिम्मेदार थीं।

इसमें परीक्षा के सभी मूल भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को तुरंत सुरक्षित रखने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है। इन रिकॉर्ड्स में मूल ओएमआर शीट, उम्मीदवारों के पास मौजूद कार्बन कॉपी, प्रश्न पत्र, उत्तर कुंजी, उपस्थिति और बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, परीक्षा-केंद्र के रिकॉर्ड, स्कैनिंग और कोडिंग रिकॉर्ड, मूल्यांकन डेटा, सर्वर रिकॉर्ड, ऑडिट ट्रेल और परिणाम-निर्माण डेटा शामिल हैं।

याचिका में रिकॉर्ड की कस्टडी की एक पूरी, समकालीन और ऑडिट-योग्य चेन बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया गया है। साथ ही, यह भी कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सामग्री को सीमित या अलग-अलग समय तक ही रखा जा सकता है और समय के साथ उनमें बदलाव, ओवरराइटिंग, उन्हें डिलीट या उनसे छेड़छाड़ की जा सकती है।

याचिका में ऐसे निर्देश देने की मांग की गई है जिनसे यह पक्का हो सके कि जांच स्वतंत्र, व्यापक और विश्वसनीय हो और जनता का भरोसा जीत सके।

याचिका में परीक्षा के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के लिए भी तुरंत निर्देश देने की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि किसी भी तरह की देरी से उनकी उपलब्धता, अखंडता और सबूत के तौर पर उनकी अहमियत पर बुरा असर पड़ सकता है। इस मामले में प्रतिवादियों में भारत सरकार, जेपीएससी, झारखंड कर्मचारी चयन आयोग, झारखंड राज्य, सीबीआई और झारखंड के पुलिस महानिदेशक (क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट) शामिल हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा और एडवोकेट सत्यम सिंह राजपूत पेश हुए।

--आईएएनएस

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